मुख्यपृष्ठसमाचारभारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की मनाई गई 20वीं पुण्यतिथि

भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की मनाई गई 20वीं पुण्यतिथि

-उनके मकबरे पर बेटों और पौत्र ने शहनाई बजाकर दी श्रद्धांजलि

उमेश गुप्ता / वाराणसी

भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब की 20वीं पुण्यतिथि दरगाह फातमान, सिगरा में मनाई गई।
उस्ताद बिस्मिल्लाह खान चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में शुक्रवार को दरगाह फातमान में सुबह 11 बजे से प्रार्थना सभा और श्रद्धांजलि कार्यक्रम की शुरुआत हुई। उस्ताद की कब्र और मकबरे पर दुआख्वानी, कुरानख्वानी के साथ श्रद्धासुमन अर्पित कर काशी ने उन्हें शिद्दत से याद किया। उनके पौत्र आफाक हैदर खान ने शहनाई की तान छेड़कर दादा की याद ताजा की। उस्ताद की चौथी पीढ़ी के प्रपौत्र मोहम्मद अली ने भी शहनाई बजाई, जिससे पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा जीवंत नजर आई।
कार्यक्रम में बिस्मिल्लाह खान के परिजनों के साथ शकील अहमद जादूगर, प्रमोद वर्मा आदि उपस्थित रहे।
शकील अहमद जादूगर ने बताया कि 21 मार्च 1916 को बिहार के डुमरांव में जन्मे बिस्मिल्लाह खान का असली नाम कमरुद्दीन था। बचपन में जब उनके दादा रसूल बख्श खान ने उन्हें पहली बार देखा तो उनके मुंह से सहसा निकला, ‘बिस्मिल्लाह’। यही नाम आगे चलकर संगीत के इतिहास का एक जगमगाता अध्याय बन गया।
महान फनकार को असल पहचान और उस्ताद बनने की राह काशी की पावन धरती पर ही मिली। महज छह वर्ष की उम्र में वे बनारस आ गए और अपने मामा अली बख्श ‘विलायती’ (अल्लन बिलातू) के सानिध्य में शहनाई सीखने लगे। उनके मामा श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाया करते थे। यहीं से नन्हे बिस्मिल्लाह के भीतर संगीत और साधना का अनूठा मेल अंकुरित होने लगा। उनकी शहनाई से निकलने वाला हर सुर लोगों के दिलों को छूने लगा और देखते ही देखते उनका नाम दुनिया के सुरमयी फलक पर जगमगाने लगा।

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