मुख्यपृष्ठस्तंभभोजपुरिया व्यंग्य : आम चूसत बाड़े नेता जी, ताकत बा जनता बेचारी!

भोजपुरिया व्यंग्य : आम चूसत बाड़े नेता जी, ताकत बा जनता बेचारी!

प्रभुनाथ शुक्ल, भदोही

हमरा यूपी में चुनाव के बयार चले लागल बा। अब नेता लोग जनता के दु:ख-सुख ना, आम के रस पर राजनीति घोले में जुट गइल बा। सत्ता पक्ष कहत बा, आर्इं, आम खार्इं, मिठास बढ़ार्इं। उधर विपक्ष बोलत बा हमरो आम खार्इं, असली स्वाद एहिजे बा।
जनता सोचतिया कि शायद अब महंगाई, बेरोजगारी, सड़क, बिजली, पानी पर बैठक होई। बाकि इहां त पूरा राजनीति आम पार्टी पर अटक गइल बा। जेकरा लगे जेतना बड़ा बगइचा, ओकरे ओतना बड़ा फोटो अउर ओतना बड़ा बयान।
बाबा के आम पार्टी में सब मुस्की मार-मार के आम चूसत रहलें। उधर भैया के आम पार्टी में भी नेता लोग २७ गो तरह के आम चूसला। एतना प्रेम से आम खाइल कि देखे वाला सोच ले कि अब दुनऊ पार्टी के भीतर मा कवनो गुटबाजी ना रहल। आम के गुठली फेंकते-फेंकते मनमुटाव भी फेंक देहल गइल।
बाकि जनता पूछतिया मालिक! ई आम के मिठास हमनी के जिनगी में कब आई? नेता लोग कहत बा पहिले आम खा लीं, चुनाव नजदीक आई त वादा भी खिला देब।
गांव के किसान सोचत बा कि जे आम उ लगवलस, ओकर दाम ना मिलल। शहर के गरीब सोचत बा कि बजार में आम खरीदल अब सपना हो गइल। बाकि नेता लोग के टेबुल पर दर्जनों किसिम के आम सजल बा – लंगड़ा, दशहरी, चौसा, सफेदा… आ फोटो देख के लागत बा कि देश के सबसे बड़ा मुद्दा अब आमे रह गइल बा।
राजनीति में अब नया नारा बन सकेला ना रोजगार के बात होई, ना महंगाई पर बहस; चलीं पहिले एगो आम खा लीं, बाकी चुनाव में देखल जाई।
सच पूछीं त नेता लोग आम खा-खा के जनता के इशारा दे रहल बा जइसे हम आम के कस के चूसत बानी, ओइसहीं चुनाव के टाइम रउआ भावनाओं के भी चूस लेब। चुनाव बीतते ही गुठली नियर जनता किनारे, आ मलाई फिर कुर्सी पर।
एह साल यूपी में आम के मौसम से जादे आम पार्टी के मौसम चल रहल बा। जनता के हिस्सा में बस फोटो, वीडियो, बयान अउर ताली आवत बा, जबकि नेता लोग के हिस्सा में रसदार आम, ठंडी हवा अउर चुनावी मुस्कान।
अब देखे के बात बा कि २०२७ में जनता आम के मिठास याद रखी कि अपना रोजमर्रा के कड़वाहट। कहीं एतना ना हो जाव कि वोट डाले के दिन जनता भी कह दे नेताजी, रउआ आम त खूब खइनी, अब पैâसला हम करब।
!!समाप्त!!

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