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बेबाक : अमेरिका ने फिर मुंह की खाई …‘नो-बेल’ तो मिलना ही चाहिए!

अनिल तिवारी
मुंबई

ऐसा बहुत कम ही होता है जब किसी खेल में मदारी ही खुद जमूरा बन जाए। इन दिनों खाड़ी में चल रहे ईरान व अमेरिका-इजरायल युद्ध में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला है। बड़बोले ट्रंप और इजरायली नेतन्याहू चले तो थे ईरान को तबाह करने, वहां पर अपना वर्चस्व स्थापित करने, पर हुआ बिल्कुल उसका उलटा।  ट्रंप और नेतन्याहू खुद जमुरे बन गए। बेचारे फंस गए।
चले थे छब्बे बनने…
२८ फरवरी २०२६ को जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर अचानक से हमले किए थे और अली खोमेनेई को मार गिराया था, तब उनका दावा था कि ये युद्ध २ से ३ सप्ताह के भीतर खत्म हो जाएगा। ईरान की सरकार घुटने टेक देगी और हम ईरानियों को उनकी अपनी सरकार बनाने का मौका देंगे। बल्कि ट्रंप ने तो यह तक कह दिया था कि हम पहले ही दिन युद्ध जीत चुके हैं। परंतु हकीकत इससे एकदम भिन्न थी। अमेरिका, इजरायल इस युद्ध को छेड़ कर बुरी तरह फंस चुके थे।
आज एक महीने से अधिक का समय बीत चुका है। ईरान झुकने के बजाय दिन-प्रतिदिन और भी आक्रामक होता जा रहा है। ईरानी जनता अमेरिका और इजरायल को सबक सिखाने के लिए सड़कों पर उतरने को तैयार बैठी है, ठीक वैसे ही सड़कों पर उतरने को, जैसे वो १९७९ में ईरानी क्रांति के समय अमेरिका के खिलाफ सड़कों पर उतरी थी। ईरानी छात्रों ने तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास में घुसकर ५२ अमेरिकियों को ४४४ दिनों तक बंधक बनाए रखा था और जब अमेरिका उनके सामने झुका, राष्ट्रपति जिमि कार्टर ने हार मान ली, उनका ऑपरेशन ईगल क्लो पूरी तरह से तबाह हो गया, तब कहीं जाकर ईरान ने बंधकों को छोड़ा, वो भी अमेरिका द्वारा जप्त की गई १२ बिलियन डॉलर की राशि प्राप्त करने के बाद।
तेल का खेल!
हार का इतिहास जानते हुए भी अमेरिका ने फिर वही गलती की है। फिर से ईरान को छेड़ा है, उसे वेनेजुएला समझने की भूल की है। उसी का खामियाजा आज पूरी दुनिया झेल रही है। अमेरिका के स्वार्थ और लालच की कीमत पूरी दुनिया का गरीब-लाचार चुका रहा है और उसे यह कीमत दशकों तक चुकानी पड़ेगी। सिर्फ ट्रंप की जिद के कारण।
किसी समय ईरान के अमेरिका से बेहतर संबंध हुआ करते थे, पर जब संबंध बिगड़े तो अमेरिका ने एक के बाद एक ईरान पर सैकड़ों प्रतिबंध लगा दिए। फिर भी ईरान की अर्थव्यवस्था और आक्रामकता को कम कर पाने में वो सफल नहीं हो पाया, तब अमेरिका ने ईरान पर आखिरकार परमाणु हथियार विकसित करने का आरोप लगाते हुए हमला कर दिया। किसी दौर में यही आरोप अमेरिका द्वारा इराक पर लगाया गया था। सद्दाम हुसैन के पास ‘वैपन्स ऑफ मास डिस्ट्रक्शन’ हैं, कहा गया था। इराक पर उसी उद्देश्य से हमला भी किया गया था, पर आखिर वहां निकला कुछ नहीं। बावजूद, उन्होंने सद्दाम को ही फांसी पर चढ़वा दिया, जो किसी दौर में उन्हीं का मित्र हुआ करता था। अमेरिका के इशारे पर ही सद्दाम ने ईरान पर ८ वर्षों लंबा युद्ध लादा था, कुवैत पर हमला किया था। उसी अमेरिका ने उसे तबाह कर डाला। इराक को अराजकता में डाल कर वहां तेल का खेल शुरू कर दिया। लड़ाई वेनेजुएला में भी तेल की है और लड़ाई ईरान से भी तेल ही की है, सिर्फ मुखौटा विश्व कल्याण का है।
हम नहीं सुधरेंगे!
अमेरिका दुनिया के दूसरे देशों को तो नसीहत देता है, युद्ध मत करो, चेतावनी देता है, प्रतिबंध लगाने की धमकी देता है। पर खुद अपने लालच में पूरी दुनिया को युद्ध में धकेलता रहता है। आज ट्रंप, वो ट्रंप जो हमेशा दावा करते रहते हैं कि उन्होंने दुनिया में न जाने कितने युद्ध रुकवाए हैं, वे ही बेवजह ईरान पर युद्ध थोपे हुए हैं, अपने अहंकार की खातिर और एपस्टीन फाइल के डर के खातिर। परंतु अफसोस ईरान से पंगा लेकर उन्होंने वही भूल की है जो किसी वक्त जिमि कार्टर ने ईरान से युद्ध करके की थी और आइजन हावर, लिंडन जॉनसन, जॉन एफ केनेडी और रिचर्ड निक्सन ने वियतनाम से लड़कर की थी। अफगानिस्तान में वही गलती जॉर्ज डब्ल्यू बुश और बराक ओबामा ने की। दो दशकों वाले वियतनाम युद्ध में अमेरिका को अपने ५८ हजार सैनिकों की मौत के बाद अपनी सेना वापस बुलानी पड़ी। अफगानिस्तान में भी उसे जान-माल की भारी हानि हुई। आखिर उसे अपने हथियार, हेलिकॉप्टर और अन्य सैन्य उपकरण वहीं छोड़कर वहां से भागना पड़ा। १८६६ में उसे अपनी ही स्थानीय जनजातियों के खिलाफ छेड़े गए रेड क्लाउड युद्ध में संधि करने पर मजबूर होना पड़ा। उससे पहले १९६१ में क्यूबा में फजीहत कराई थी। १८१२ में भी अंग्रेजों से लड़कर काफी नुकसान उठाया था। परंतु अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने इससे कोई सबक नहीं लिया।
अमेरिका का इतना बड़ा असफल युद्ध इतिहास होने के बाद भी वो हमेशा दुनिया से लड़ने को लालायित रहता है। कभी गलती मान लेता है तो कभी अहंकार में अंधा हो जाता है। अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कभी माना था कि लीबिया सैन्य हस्तक्षेप उनकी सबसे बड़ी गलती थी। परंतु यह तय है कि ट्रंप कभी भी अपनी गलती नहीं स्वीकारेंगे। यह जानते हुए कि अमेरिका के तमाम राष्ट्रपतियों की गलतियों ने न केवल अमेरिकी अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है, वैश्विक अस्थिरता और क्षेत्रीय संतुलन को बिगाड़ कर तमाम देशों को आतंक की आग में धकेल दिया है, फिर भी वे जिद जारी रखेंगे। अर्थात, युद्ध रुकवाने के लिए न सही पर बार-बार दुनिया को युद्ध के संकट में डालने व अंत में थूक कर चाटने की परंपरा को अनवरत जारी रखने के लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार जरूर मिलना ही चाहिए। सिर्फ ट्रंप को ही क्यों अमेरिका के दर्जनों राष्ट्रपतियों को नोबेले मिलना चाहिए!

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