अनिल तिवारी
मुंबई
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब-जब विदेश जाते हैं तब-तब देश में विपक्षी नेता और सत्ता आलोचक, उनकी यात्राओं का विरोध करते हैं। ऐसा वे क्यों करते हैं, यह समझ से परे है।
‘मित्रवत’ मोदी
अरे, जो व्यक्ति कभी मुस्कुराता तक न हो, दाएं-बाएं इर्द-गिर्द के लोगों पर नजर तक न डालता हो, किसी से हाथ मिलाने में उसे कोफ्त आती हो, किसी को तवज्जो देना उसे अच्छा न लगता हो, वो व्यक्ति यदि विदेश जाकर बिना किसी वजह के खिल-खिलाकर हंसता है, लोगों के गले पड़कर उनसे गले लगता है, सभी से आत्मीय संबंध होने का आभास कराता है, तो भला उसके विदेश जाने पर किसी को क्यों आपत्ति होनी चाहिए? जब कोई हंस रहा है, अपने हाव-भाव प्रदर्शित कर रहा है, सजग-जीवंत, भावनात्मक और मित्रवत होने का परिचय दे रहा है तो भाई आपत्ति क्यों?
खीज और ‘टास्क’
वैसे भी यदि मोदी जी देश में रहते हैं, संसद में जाते हैं तो आप उनसे सवाल पूछ-पूछकर उन्हें परेशान कर देते हैं। बेरोजगारी, महंगाई, रुपए में गिरावट, अन्य देशों से बिगड़ते संबंध, देश में अराजकता, भाजपाइयों की ऊटपटांग हरकतें, चीनी घुसपैठ, सेना के टूटते मनोबल, ईडी-सीबीआई की तानाशाही, विपक्ष का दमन, ढोंगी व दागियों का भाजपा प्रवेश, शिक्षा क्षेत्र की अड़चनें, महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार, हर क्षेत्र में चढ़ता भ्रष्टाचार और न जाने क्या-क्या! आप सवाल पूछते हो। जब भला मोदी जी का इन मुद्दों से कोई वास्ता ही नहीं है तो भला वे जवाब क्या देंगे। उस पर मोदी जी को तो जवाब देना तक नहीं आता। तभी तो गत १२ वर्षों में उन्होंने एक भी पत्रकार परिषद नहीं की। गुजरात में प्रयास किया था तो पत्रकारों ने ‘पानी’ पिला दिया। तब से मोदी जी सवालों से बचते हैं। फिर चाहे वो पत्रकारों के हों या विपक्ष के। इसलिए मोदी जी संसद आना पसंद नहीं करते। विपक्ष की इन्हीं हरकतों पर उन्हें खीझ आती है। इसे विपक्ष भी अच्छी तरह जानता है। फिर भी उन पर सवाल दागता है। ऐसे में बेचारे मोदी जी क्या करें? उन्हें हारकर, न चाहते हुए भी मजबूरन ईडी-सीबीआई को जवाब देने को भेजना पड़ता है। विपक्ष का मुंह बंद करवाने का टास्क देना पड़ता है। अगर विपक्ष जनहित के मुद्दों पर बात न करे और मोदी जी को शांति से ध्रुवीकरण ‘विकास’ की राजनीति करने दे, नेहरू-गांधी के मत्थे आरोप मढ़ने दे, पुरानी सरकारों को नाकारा साबित करने दे तो मोदी जी भला क्यों नाराज होंगे? वे क्यों आपको जेलों में ठूंसेंगे? वे तो बेहद शांतिप्रिय हैं। पर जब आप जिद पर अड़ते हो तो वे भी जिद पर आ जाते हैं। विपक्ष इतनी जिद न करा करे, कहीं ऐसा न हो कि आपके बेहूदा सवालों से उकताकर मोदी जी हमेशा के लिए ही ‘विदेश’ न चले जाएं। क्योंकि उन्हें तो वही पसंद आता है जो विपक्ष को पसंद नहीं होता।
‘पापा वॉर रुकवा दो’!
अब तो संसद की नई इमारत भी खड़ी हो गई है। मोदी जी ने बनवाई है। तो भाई जब उनका मन करेगा वे आएंगे, नहीं करेगा तो विदेश निकल जाएंगे। आपको इस पर आपत्ति क्यों है? बल्कि मैं तो मानता हूं कि मोदी जी को फिर से तुरंत विदेश यात्रा पर निकल जाना चाहिए। मौका भी है और दस्तूर भी। संसद भी चल ही रही है और युद्ध भी हो ही रहा है। मौसम एकदम फिट है! मोदी जी यदि इस वक्त विदेश जाते हैं तो कई फायदे होंगे। एक तो उन्हें विपक्ष के उलजुलूल सवालों से बचने का मौका मिल जाएगा, दूसरे अपनी युद्ध रुकवाने की कड़ी में वे एक और उपलब्धि हासिल कर लेंगे। तमाम युद्ध उन्होंने रुकवाए हैं। युद्ध रुकवाने में उनकी महारत जो है। ट्रंप के कहने पर उन्होंने पाकिस्तान के साथ अपना युद्ध तक रुकवा दिया था तो भला ये युद्ध वे क्यों नहीं रुकवा सकते! उस पर लगे हाथों ट्रंप से रूसी तेल खरीदने की इजाजत भी वे ले ही सकते हैं। ट्रंप उन्हें ऐसा करने की सहर्ष इजाजत भी दे ही देंगे। जिगरी दोस्त जो हैं दोनों। ‘माई फ्रेंड ट्रंप’ अपने दोस्त के लिए इतना तो कर ही सकते हैं। जब ‘विश्वगुरु’ मोदी जी उनके लिए वोट मांग सकते हैं, तब भला वो रूसी तेल क्यों नहीं दिलवा सकते? बिलकुल दिलवा सकते हैं।
खैर, देश में रहकर मोदी जी भले ही देशवासियों के हित का काम न कर सकते हों (विपक्ष और नेहरू-गांधी के कारण) पर विदेश जाकर तो वे कुछ न कुछ कर ही सकते हैं न। इसीलिए मोदी जी का ‘विदेश’ जाते रहना बेहद जरूरी है। मोदी जी के ‘विदेश’ जाने में ही देश का हित है। ये बात सभी गांठ बांधकर याद कर लें और उनकी विदेश यात्राओं का विरोध छोड़ दें। इसी में सबकी भलाई है। देश की भी!
