मुख्यपृष्ठसमाज-संस्कृतिपुस्तक समीक्षा : "मुंबई, बंबई, बॉंम्बे"... स्याह रंग की अनसुनी आवाजें

पुस्तक समीक्षा : “मुंबई, बंबई, बॉंम्बे”… स्याह रंग की अनसुनी आवाजें

इन्दिरा किसलय

हजार चेहरे मुंबई के, फिर भी बेचेहरा।इसके वजूद की पहचान इतनी आसान भी नहीं। “बालासाहेब लबडे “द्वारा प्रणीत यह कृति, मुंबई की धड़कनों का कोलाज है। इसमें समुद्र का खारापन, जल की नमी है, तो लहरों का संगीत कम, उत्पात ज्यादा सुनाई देता है। एक मोहाविष्ट दर्शक की दृष्टि से परे, कवि ने मुंबई में दिन के बहुरंगी ऐश्वर्य को नहीं, रात की कालिमा में ढंकी कितनी ही अस्फुट, कातर और अनसुनी आवाजों को समेटा है।
अनेक भाषा, धर्म, जाति वर्ग, और विश्वास एवं सियासी ताने बाने से बुना यह महानगर, कवि के शब्दों में “महा मिथक””एक स्वप्न नगरी”,”महामाया” ही है, जो तिलिस्मी है और भयावह भी ।कृति में इलीट क्लास का भद्रलोक तो है, लेकिन उस जीवनशैली के पीछे जो अप्रिय सत्य छिपा है, उसका अनावरण किया गया है ।
मुंबई से कवि का 40 वर्षों का नाता है।यही कारण है कि उनकी सूक्ष्म ग्राही दृष्टि की पकड़ में हर वो दृश्य, व्यक्ति और घटना है, जो अक्सर साहित्यकारों की नज़र से छूट जाती है, इसलिए कि “लोग क्या कहेंगे।” यह कृति मुंबई पर बनाई गई किसी फिल्म का हिस्सा लगती है। भाषा ने कैमरे का काम किया है।
उपभोक्तावाद, रफ्तार, महत्वाकांक्षा और द्रव्य के पीछे दौड़ने को विवश करती है, मुंबई समूचे देश को लुभाती है। कवि ने इसे एहसास के तल पर जिया है।जानकारी विस्फोट के दौर में शहर का हर रंग तलाशना बहुत आसान है पर कवि ने उसे आत्मीय और निर्विकल्प सच्चाई के तल पर अनुभव किया है।
एक संतृप्त अभिमान अपने शहर को लेकर कुछ इस तरह व्यक्त हुआ है–
” मुंबई हमारे हक की,
नहीं किसी के बाप की,
जय महाराष्ट्र”
मुंबई के दावेदार इस कविता में वे कहते हैं–
“एकता का बांध कभी बांधती है मुंबई माझी।”
वहां की यांत्रिक जीवन शैली का एक सचल चित्र पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत है–
एशिया खंड की सबसे बड़ी फन लैंड–
“संवेदना, गुम हुआ शहर, अधिकाधिक होता जाता है नटखट गो हाई के अंतरंग में।”
धारावी, एशिया की सबसे बड़ी झोपड़ पट्टी पर पाठकों ने कई बयान सुने होंगे,पर कवि मन के उद्गार कुछ ऐसे हैं–
“मरूस्थल में धारावी की झोंपड़ियां क्यों भूखी,
छलती यह पेटेश्वरी,
जीवन्तता की एकादशी।”
नैतिकता की सभी कल्पनाएं, सभी मानदंड यहां रोटी हेतु शरण जाते हैं और कहीं खो जाते हैं।यह विश्व का सबसे अंतिम छोर है, आश्चर्य का स्थान है।
शिवाजी पार्क, लोकल की संगत से, सी-एस-टी, डांस बार, ससून डाॅक,लोकल के कनखजूरे निकले साथ, कचरा बीनते बच्चे,फोर्ट की स्त्रियां, फैशन स्ट्रीट, रूमब्वाॅय हेतु दो शर्तें,चूहे बेचने के लिये बैठे हैं अपने दांत-, कचरापेटी चिल्लाट– ऐसे कितने ही शीर्षक हैं, जो मुंबई के विषय में जिज्ञासा जगाते हैं।
एक कविता जिसे कहीं और पढ़ा जाना असंभव है,
“नियर सहारा एयरपोर्ट” घृणा और जुगुप्सा उपजाती है। कभी-कभी उनकी कविता के अंत में सुभाषित भी हासिल होते हैं।
“समय का चेहरा कभी किसी को पकड़ में आया है क्या?”
“इंसानियत का कोई धर्म नहीं होता।”
दृश्य समाज की अदृश्य परतों को शब्दशः उधेड़ते हुए, कवि इस बात की गवाही देते हैं कि आत्मीयता सिर्फ रंग, रूप और सौंदर्य की मुखापेक्षी नहीं होती।उनके अनुभव पाठकों के लिए एक सवाल बनकर उपस्थित होते हैं, जिसकी गूँज क्षितिज तक पहुँचती है।
“मीठी नदी” की दुर्दशा भी उन्हें चिंतित करती है।
इन सर्वथा गद्यात्मक कविताओं के बिंब इतने सघन और गरिष्ठ हैं कि मूल कथ्य तक पहुँचने में कवायद करनी पड़ती है। रूपक, प्रतीक, प्रतिमान, बिंब कहीं भी पारंपरिक नहीं हैं। कविता को मुक्त कर दिया है उन्होंने किसी भी शास्त्रीय बंधन से, जो भावावेग को संभाल न सके।
कृति अनुवादित है।अनुवादक हैं “भारत वेडे”। मूल मराठी में इसका आस्वाद जरा भिन्न ही होगा।कविता का मौलिक अंदाज़ सुरक्षित होगा।हर भाषा का अपना स्वभाव, सरोकार, लय और बरतने का तरीका होता है।
शहर के गत्यात्मक ,चाक्षुष बिंबों को स्थिर शब्दों के हवाले करना आसान नहीं है। मुंबई के सांस्कृतिक स्पंदन से उपजी स्थानीय बोलियां, शब्द, गालियां ,पारिभाषिक शब्द सिर्फ मुंबई में ही पाये जा सकते हैं, जिसे कवि ने अचूक दर्ज किया है।
शहर जब नायक की भूमिका में है, तो उसके आचरण का रेशा-रेशा खुलता ही चला जाता है, हर्फ दर हर्फ। मूल बंबईया शब्दों ने अभिव्यक्ति को प्रामाणिकता दी है।सब कुछ ऑर्गेनिक, कहीं मिलावट नहीं.।कुछ शब्द जैसे सुमड़ी, खोका, राड़ा, मुलुख, टाली, टपोरी, बेवड़ा, तथा कुछ अंग्रेजी के मिश्रित शब्द भी धड़ल्ले से चलते हैं।
अनैतिकता या महानगरों के यौनिक स्याह चेहरे– जैसे मालिश सेंटर, मेगा ब्लॉक में डान्स बार—इनके पीछे छिपी विवशताएं झांक रही हैं।
इस विश्व में बिकता नहीं ऐसा कुछ भी नहीं
शाश्वत ऐसा कुछ भी नहीं होता।
प्रॉपर्टी डीलर शीर्षकवाही कविता में उनकी व्यंजना दृष्टव्य है–
तो खरीदा जा सकता है जनतंत्र,
केवल ये जनतंत्र के बिल्डर हैं।
जिन्होंने मुंबई की जीवन रेखा की वक्र सरलता नहीं देखी, उसे जिया नहीं, वे पढ़ते ही चौंक जाएंगे। अधिकांशतः अभिव्यक्ति अगम ही रही आएगी।
कथ्य, भाषा, शिल्प, हर दृष्टि से बेहद अनोखी है यह कृति, इसे अपूर्व ही कहेंगे।
हिंदी अनुवाद में वर्तनी यदा कदा प्रश्न बन सकती है।अंततः कवि एक द्वन्द्व उपस्थित करते हैं–
कवि अर्थात हम,
ले सकते हैं क्या बंदूक हाथ में, क्या बैठ सकते हैं अनशन को
यह कृति हिंदी और मराठी के बीच ऐसा पुल बनाती है, जो हर मौसम, हर आघात के बीच भी अटूट रहेगा।अरब सागर, वैश्विक पहचान एवं तकनीकी औद्योगिक विकास का लोहा मनवाती हुई मुंबई, अपनी ही सतह के नीचे एक अनाम लोक से अनजान प्रतीत होती है, और वही कवि का उपजीव्य है।
यह साहित्य के इतिहास में साहस का प्रतिमान है।अनुभूति की तीक्ष्णता और अनूठी अनगढ़ शैली इसे साहित्य विश्व में क्रांतिकारी सिद्ध करती है। लिटिल बर्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली का यह अनुवादित शाहकार पाठकों के मन को निश्चय ही आंदोलित करेगा और एक स्थायी स्मृति बनकर हृदय में सुरक्षित रहेगा।

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