मुख्यपृष्ठनए समाचारपुस्तक समीक्षा : भावात्मक अनुवाद की खुशबू!

पुस्तक समीक्षा : भावात्मक अनुवाद की खुशबू!

राजेश विक्रांत।  हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि, नाटककार, समीक्षक डॉ. नरेंद्र मोहन की आत्मकथा `कमबख्त निंदर’ का यशोधरा काटकर द्वारा इसी नाम से किया गया मराठी में अनुवाद दरअसल भावात्मक अनुवाद की खुशबू से भरपूर है इसलिए उसमें तत्कालीन समाज के उतार-चढ़ाव व संवेदनाओं की भावात्मक खुशबू के दर्शन होते हैं। यशोधरा काटकर समकालीन मराठी साहित्य की अग्रणी लेखिका हैं। मराठी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं इसलिए वे `कमबख्त निंदर’ की मूल भावनाओं को समझने में पूरी तरह से कामयाब हुई हैं।
`कमबख्त निंदर’ में आत्मकथा के बहाने भारतीय इतिहास के तीन कालखंड को समेटा गया है। लाहौर का १९३५ का कुख्यात दंगा, जिसमें प्रशासन ने दंगाइयों को देखते ही गोली मारने के आदेश जारी कर दिए थे, चारों तरफ पकड़ो, मारो काटो की क्रूर आवाजों के बीच लाहौर के धर्मपुरा में ३० जुलाई को नरेंद्र मोहन का जन्म हुआ। दूसरा कालखंड आजादी के समय का विभाजन है। तीसरा कालखंड १९७५-७७ की इमरजेंसी है। यह पूरी पुस्तक `कमबख्त निंदर’ इन्हीं तीनों कालखंडों का लेखा- ऐंजोखा पेश करती है। सन् १९४६ में नरेंद्र मोहन ने लाहौरवैंâट हाईस्कूल में प्रवेश लिया और विभाजन के पहले के डर से रू-बरू हुए। बेहद विषम परिस्थितियों में उन्हें अपने परिवार समेत १८ अगस्त १९४७ को लाहौर छोड़ना पड़ा और अमृतसर के खालसा कॉलेज के शरणार्थी शिविर में शरण लेनी पड़ी। अक्टूबर में उनका परिवार पालमपुर पहुंचा और १९४८ में उन्हें पालमपुर के मिशन हाईस्कूल में भर्ती कराया गया। १९५० में यह परिवार अंबाला पहुंचा। १९५२ में नरेंद्र मोहन ने कविता, लेख आदि लिखना शुरू किया। बाद में उन्होंने बीए, एमए पीएचडी किया। लुधियाना कॉलेज, लायलपुर खालसा कॉलेज जालंधर, गवर्नमेंट कॉलेज रोपड़, पंजाब कृषि विश्वविद्यालय हिसार होते हुए वे दिल्ली के खालसा कॉलेज में नियुक्त हुए। सन २००० में वे दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से रिटायर हुए। `कमबख्त निंदर’ के अध्याय हैं- निंदर कहां हो तुम, स्वतंत्रता और अग्निकांड, तुम अगर भूल भी जाओ, एक शहर एक सुगंध, एक बुद्ध…., कौन जाए जौक पर, एक अद्भुत कथा का बिखरना, वेदना की रेखाएं, दिल्ली पर विश्वास वैâसे करें और कमबख्त निंदर। अनुवाद में भी यशोधरा काटकर मूल पुस्तक की भावनाओं को बनाए रखने में सफल हुई हैं। तीन कालखंडों की आत्म गाथा `कमबख्त निंदर’ को मेहता पब्लिशिंग हाउस पुणे ने प्रकाशित किया है। १७४ पेज की इस पेपर बैक किताब का मूल्य २५० रुपए है।

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