–नवीन सी. चतुर्वेदी
एक व्यक्ति के परिवार सों कोऊ परलोक सिधारौ सो वा नें पोस्ट डारी कि हमारे फलाने-फलाने सिधार चुके हैं। नये जमाने के नये तरीका हैं। अब वा पोस्ट पै ऐसे-ऐसे कमेन्ट आये कि मत पूछौ। कमेन्ट तौ कमेन्ट विन कमेन्ट’न पै काहू भले आदमी नें फेक आय डी सों जो जवाब लिखे, वे और हू कमाल के। कछू बानगी देखा।
पहला कमेन्ट ‘हाय, ये क्या हो गया? यकीन ही नहीं हो रहा कि सो एंड सो हमारे बीच नहीं रहे’। या कमेन्ट के जवाब में कमेन्ट भयौ कि ‘ऐसी क्या बात है भैये, यकीन नहीं हो रहा तो आप भी सटक के देख लें, फिर पक्का यकीन हो जायेगा’।
दूसरा कमेन्ट ‘अब हमारा क्या होगा’? उस पर जवाब, ‘क्यों भैये, इनसे वजीफा मिल रहा था क्या?’
तीसरा कमेन्ट ‘अब हम कैसे जियेंगे’? उसका जवाब, ‘भैये, ऐसी क्या बात है, इनके बिना जीना अगर इतना ही दुश्वार है, तो सोच क्या रहे हो, आप भी निकल लो, चित्रगुप्त कहीं न कहीं आपका टांका फिट करवा ही देंगे’। इस पर एक और पहुंचे हुए ने पूछा ‘चित्रगुप्त कैसे टांका फिट करवा देंगे’। उस कमेन्ट पर जवाब, ‘जैसें अपने यहां मरे भये लोग कागज’न पै जीते रहें, वैसें ही यमलोक के रिकोर्ड्स में हू झोलझाल चलती रहें। जितने लोग यमलोक के रजिस्टर के हिसाब सों हाजिर होने चैंयें, वे कभू टैली होमें ही नांय नें। अंडर टेबल सेटिंग वहां भी चलें है। हैं तौ वहां हू यहां के लोग ही न भैया। और यहां के लोग जहां जामें वा जगे कों अपनी जैसी बनाय ही लेमें हैं। झूठ लगतौ होय तौ स्वयं ही देख लेउ। न अब कश्मीर, कश्मीर जैसौ रह्यौ, न लन्दन लन्दन जैसौ। ज्हां-ज्हां पांय परे सठ’न के, म्हां-म्हां वंटाधार भये। जिन पहाड़’न में कभू ऋषि मुनि लोग तपस्या करौ करते वहां अब निरी लपस्या ही लपस्या दिखाई परै है। न साफ पानी, न साफ हवा। वौ दिन दूर नांय नें जब अपुन लोग मंगल पै पहुंच कें वाके मंगल की ऐसी वाट लगामंगे कि बिचारौ झुंड मंगल हू मंगल भवन अमंगल हारी कौ पाठ करवे लगैगौ’। बोलौ सियावर राम चन्द्र की जय।
