-२०२३ के फैसले को कैबिनेट एजेंडे में दोबारा लाने का आरोप; दानवे ने सरकार की कार्यशैली पर उठाए सवाल
सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र की महायुति सरकार पर अब पुराने फैसलों और घोषणाओं को नए पैकेज में पेश कर दोबारा श्रेय लेने का आरोप लग रहा है। कल हुई कैबिनेट बैठक में माजलगांव और पंढरपुर में बांध निर्माण से जुड़े ३,९९३ करोड़ रुपए के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इसे लेकर जोर-शोर से बयान दिया। लेकिन विपक्ष का दावा है कि जिन महत्वपूर्ण परियोजनाओं को लेकर सरकार ने घोषणा की है, उनके मूल पैâसले पहले ही लिए जा चुके हैं। विपक्ष के अनुसार, माजलगांव बांध के चरण-२ से जुड़ा निर्णय वर्ष २०२३ में ही लिया जा चुका था। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि सरकार नए निर्णय ले रही है या पुराने फैसलों पर दोबारा मुहर लगाकर अपनी उपलब्धियां गिना रही है।
शिवसेना विधायक अंबादास दानवे ने सोशल मीडिया के जरिए सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने जानकारी दी कि माजलगांव बांध के चरण-२ का मूल निर्णय और घोषणा १६ सितंबर २०२३ को ही की जा चुकी थी। इसी तरह पंढरपुर की ३,९९३ करोड़ रुपए की विकास योजना से जुड़े निर्णयों का सरलीकरण १८ जून २०२६ को किया जा चुका था। इसके बावजूद इन परियोजनाओं को फिर से वैâबिनेट के एजेंडे में लाकर चर्चा और घोषणा का रूप देना सरकार की कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है। विपक्ष का आरोप है कि महायुति सरकार की राजनीति अब ‘घोषणा करो, फिर घोषणा करो और फिर उसी घोषणा का श्रेय लो’ तक सीमित होती जा रही है। परियोजनाओं के मूल पैâसले पहले लिए जाते हैं, लेकिन जमीन पर काम शुरू करने और उन्हें समयबद्ध तरीके से पूरा करने के बजाय उन्हीं पैâसलों को नए राजनीतिक पैकेज में पेश किया जाता है। यानी जनता को विकास का नया पैकेज दिखाया जा रहा है, जबकि उसके भीतर कई पैâसले पुराने ही हैं।
यही वजह है कि सरकार की घोषणाओं और वास्तविक कार्यान्वयन के बीच का अंतर लगातार चर्चा में है।
पुराने फैसलों की नई पैकेजिंग?
महाराष्ट्र की राजनीति में पिछले कुछ समय से विभिन्न परियोजनाओं, योजनाओं और सरकारी फैसलों को लेकर इसी तरह के आरोप सामने आते रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि एक ही परियोजना की घोषणा अलग-अलग अवसरों पर अलग-अलग तरीके से करके सरकार राजनीतिक लाभ और श्रेय लेने की कोशिश करती है। अब माजलगांव और पंढरपुर की परियोजनाओं को लेकर उठे सवालों ने एक बार फिर सरकार की घोषणाओं और उनके वास्तविक क्रियान्वयन के बीच के अंतर को बहस के केंद्र में ला दिया है।
