सामना संवाददाता / मुंबई
विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर ने अधिकार क्षेत्र नहीं होने के बावजूद राजनीतिक पार्टी के नेतृत्व को लेकर गलत फैसला दिया। उन्होंने दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के तहत अपने अधिकारों का साफ-साफ उल्लंघन किया है। उन्होंने कानून के सभी सिद्धांतों को ताक पर रख दिया। गद्दार विधायकों की अयोग्यता को लेकर क्या पैâसला करना है, यह उन्होंने पहले ही तय कर लिया था और उसी निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए जटिल तर्क पेश किए। उन्होंने विधायक दल और राजनीतिक पार्टी को एक-दूसरे में मिला दिया। वास्तव में उद्धव ठाकरे के नेतृत्ववाली शिवसेना ही ‘असली राजनीतिक पार्टी’ है। ऐसी जोरदार दलील वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कल सुप्रीम कोर्ट में दी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष शिवसेना मामले की अंतिम सुनवाई चल रही है। इस मामले में शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे की ओर से सिब्बल लगातार तीसरे सप्ताह जोरदार दलीलें पेश कर रहे हैं। उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर की कथित पक्षपातपूर्ण भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि नार्वेकर ने दसवीं अनुसूची के तहत अपने अधिकारों की सीमा पार की। तथ्यों की अनदेखी की। सिब्बल ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष ने यह गलत निष्कर्ष निकाला कि बहुमत वाले विधायक ही राजनीतिक पार्टी का प्रतिनिधित्व करते हैं।
आज भी जारी रहेगी सुनवाई
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष बुधवार को भी शिवसेना मामले की सुनवाई जारी रहेगी। शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे की ओर से कपिल सिब्बल गद्दार विधायकों की अयोग्यता के मुद्दे पर अपनी शेष दलीलें पेश करेंगे।
वास्तविक राजनीतिक पार्टी उद्धव ठाकरे के नेतृत्ववाली शिवसेना ही है
उद्धव ठाकरे पार्टी प्रमुख थे। उन्होंने ही विधायकों का चयन किया था। उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया और उन्हीं के नेतृत्व में विधायकों को पार्टी का चुनाव चिह्न मिला। जब यह बात विधानसभा अध्यक्ष भी स्वीकार करते हैं तो फिर पार्टी प्रमुख का पैâसला राजनीतिक पार्टी की इच्छा नहीं है, ऐसा वैâसे कहा जा सकता है? उन्होंने कहा कि कानून में ऐसा कोई सिद्धांत नहीं है जिसके तहत विधायी दल को राजनीतिक पार्टी माना जाए। विधायी दल को राजनीतिक पार्टी नहीं माना जा सकता। वास्तविक राजनीतिक पार्टी उद्धव ठाकरे के नेतृत्ववाली शिवसेना ही है।
दलबदल विरोधी कानून के मूल उद्देश्य को ही कमजोर किया
सिब्बल ने आरोप लगाया कि शिंदे गुट द्वारा जारी व्हिप और नेताओं की नियुक्ति को वैध मानकर विधानसभा अध्यक्ष नार्वेकर ने दसवीं अनुसूची की मूल संरचना और उसके उद्देश्य को ही कमजोर कर दिया। सिब्बल ने इसी आधार पर विधानसभा अध्यक्ष के पैâसले में हुई कथित कानूनी गलतियों पर सवाल उठाया।
पहले होना चाहिए था गद्दार विधायकों की अयोग्यता पर फैसला
सिब्बल ने दलील दी कि विधानसभा अध्यक्ष को सबसे पहले गद्दार विधायकों की अयोग्यता पर पैâसला करना चाहिए था। इसके बाद चुनाव आयोग को राजनीतिक पार्टी को लेकर पैâसला करना चाहिए था। गद्दार विधायकों की अयोग्यता तय होने के बाद ही चुनाव आयोग को यह निर्धारित करने की स्वतंत्रता मिलती कि वास्तविक राजनीतिक पार्टी कौन है।
सिब्बल की दलीलों के मुख्य मुद्दे
-दसवीं अनुसूची के अनुसार, यदि कुछ विधायक या सांसद पार्टी छोड़ते हैं तो वे स्वत: अयोग्य हो जाते हैं। यदि दो-तिहाई विधायक या सांसद पार्टी छोड़ते हैं तो वे किसी अन्य पार्टी में विलय कर सकते हैं। शिवसेना के मामले में इन प्रावधानों के विपरीत जाकर चुनाव आयोग और विधानसभा अध्यक्ष ने पैâसला दिया।
– विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका केवल ‘सुभाष देसाई मामले में हुए निर्णय’ के खिलाफ ही नहीं, बल्कि कानून के सभी सिद्धांतों के भी खिलाफ है। ‘व्हिप’ जारी करने का अधिकार केवल हमें था।
