सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र के लाखों किसान लंबे समय से कर्जमाफी की घोषणा का इंतजार कर रहे थे। राज्य मंत्रिमंडल ने आखिरकार किसान कर्जमाफी योजना के प्रस्ताव पर सहमति तो दर्शाई है, लेकिन इसके बावजूद किसानों के खातों में तत्काल राहत पहुंचने के बजाय सरकार लंबा समय लेगी। सरकार ने चुनाव आचार संहिता का हवाला देते हुए घोषणा और अमल को टाल दिया है।
मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में दो लाख रुपए तक की फसल ऋण माफी को सहमति मिली है। सरकार का दावा है कि इस योजना से ५६ लाख किसानों को लाभ मिलेगा और ६५ लाख से अधिक ऋण खातों पर लगभग ३६,५८५ करोड़ रुपए का बोझ राज्य सरकार उठाएगी। नियमित रूप से कर्ज चुकाने वाले किसानों को ५० हजार रुपए का प्रोत्साहन अनुदान देने का भी निर्णय लिया गया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मंत्रिमंडल ने योजना को मंजूरी दे दी है तो फिर किसानों को इसका लाभ तुरंत क्यों नहीं दिया जा रहा? सरकार का कहना है कि विधान परिषद चुनाव की आचार संहिता लागू होने के कारण फिलहाल औपचारिक घोषणा नहीं की जा सकती। हालांकि, विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग का नाम लेकर सरकार समय निकाल रही है और किसानों को राहत देने में अनावश्यक विलंब कर रही है। सरकार किसानों को तड़पने का काम कर रही है। किसान संगठनों का कहना है कि विधानसभा चुनाव से पहले कर्जमाफी का मुद्दा जोर-शोर से उठाया गया था। विपक्ष का आरोप है कि सरकार घोषणाओं के जरिए राजनीतिक संदेश देना चाहती है, जबकि किसानों को वास्तविक आर्थिक सहायता देने के मामले में टालमटोल की नीति अपनाई जा रही है। उनका कहना है कि चुनाव आयोग का हवाला देना केवल एक प्रशासनिक बहाना है, जबकि किसानों को तुरंत राहत देने के लिए सरकार के पास पर्याप्त अवसर थे।
