मुख्यपृष्ठस्तंभकांव-कांव : मेरी भी थोड़ी बेइज्जती कर दीजिए प्लीज!

कांव-कांव : मेरी भी थोड़ी बेइज्जती कर दीजिए प्लीज!

पिछले कुछ समय से मुझे कुछ ज्यादा ही इज्जत मिल रही है। जहां जाता हूं, लोग सम्मान से पेश आते हैं। कोई आदरपूर्वक नमस्कार करता है। कोई मुस्कुराकर हालचाल पूछता है। कुछ लोग तो मुझे इतना सम्मान देते हैं कि मेरे सामने अपनी कुर्सी तक छोड़ देते हैं। शुरू-शुरू में अच्छा लग रहा था। लगा कि जिंदगी में मैंने कुछ तो कमाया है। लेकिन अब इस इज्जत से मैं ऊबने लगा हूं। इस इज्जत का पेट भरने में कोई योगदान नहीं। तो सिर्फ नमस्कार और आदर से कितनी देर गुजारा किया जाता। सबसे बड़ी परेशानी तो यह है कि इज्जत देनेवाले लोग कंजूस होते हैं। सम्मान तो भरपूर देंगे, लेकिन खाना खिलाना तो दूर चाय पिलाने की नौबत आते ही निकलने की सोचने लगते हैं। तारीफ करेंगे। आपकी प्रतिभा का बखान भी करेंगे। कहते हैं कि आप जैसा दूसरा नहीं। मगर जैसे ही आप पूछेंगे कि चाय पिलाइए तो अचानक बहाना करने लगते हैं।
इसके उलट मैंने सुना है, बेइज्जती करने वाले बड़े दिल के होते हैं। भले वे आपकी बेइज्जती करेंगे, लेकिन यह जरूर कहेंगे, ‘आइए, कुछ खा-पी लीजिए।’ कई बार तो बेइज्जती के बाद बाकायदा छककर भोजन करवा देते हैं। ऐसे उदार लोगों के सामने इज्जत देने वाले पानी भरते नजर आते हैं।
एक बार एक मित्र ने पब्लिकली एक व्यक्ति की खूब बेइज्जती की। उसके हर गुण पर सवाल उठा दिए। वह बेचारा चुपचाप सुनता रहा। लेकिन थोड़ी देर बाद उन्होंने उस व्यक्ति को अपने साथ होटल चलने का न्योता दिया। वहां शानदार नाश्ता कराया। उस व्यक्ति ने मन ही मन हिसाब लगाया कि अगर हर बेइज्जती के साथ ऐसा नाश्ता मिलता रहा तो महीने का खाद्य बजट आसानी से निकल जाएगा। यह बात उसने मुझे बताई थी।
उस व्यक्ति ने मेरी सोच बदल दी। अब मैं दोस्तों से आग्रह करता हूं। भाईसाहब, कभी मेरी भी बेइज्जती कर दिया करें। जरूरी नहीं कि बेइज्जती बहुत बड़ी हो। छोटी-मोटी बेइज्जती भी चलेगी। बस उसके बाद चाय-नाश्ते का प्रबंध हो। अगर बेइज्जती बड़ी होगी तो लंच जरूरी है। अगर उससे भी बड़ी बेइज्जती करेंगे तो कुछ जेब खर्च भी देना पड़ेगा। अब आप तय करिए, मैंने बेइज्जती का रेट आपको बता दिया।
उस परिचित ने मेरी बात सुनकर पूछा, ‘आपको बेइज्जती से डर नहीं लगता?’
‘डर किस बात का? इज्जत से ही कौन-सा बैंक बैलेंस बढ़ रहा है! कम से कम बेइज्जती में खाने-पीने की संभावना तो बनी रहती है। फिर कभी-कभार पिकनिक भी हो जाती है।’
मैंने सोचा, अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर भी एक अपील डाल दूं, ‘मेरी बेइज्जती करनेवालों का स्वागत है, जो सज्जन मेरी बेइज्जती करना चाहते हैं, कृपया पहले अपॉइंटमेंट लेकर आएं। व्यक्तिगत बेइज्जती, पब्लिक बेइज्जती और ऑनलाइन बेइज्जती की अलग-अलग रेट हैं। अगर दोपहर में बेइज्जती करेंगे तो लंच कराना पड़ेगा। रात में बेइज्जती के लिए डिनर जरूरी है। यानी बेइज्जती करने के भी पैकेज होंगे।’
एक सज्जन ने चेतावनी दी, -ज्यादा बेइज्जती कराने से प्रतिष्ठा खत्म हो सकती है। आप समाज में प्रतिष्ठित हैं।
मैंने उनसे कहा, प्रतिष्ठा बचाकर क्या करना है? अचार थोड़ी डालना है। फिर प्रतिष्ठा को कोई खाता तो है नहीं।
अब मेरी बस एक ही इच्छा है। जिन लोगों ने मुझे इज्जत दे रखी है, वे थोड़ी बेइज्जती भी कर दें। आखिर संतुलन भी कोई चीज होती है।
मैंने उन्हें झिड़कते हुए कहा, देख नहीं रहे हैं, जिन लोगों की बेइज्जती हो रही है, दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहे हैं। ऐसे में आप मुझसे बेइज्जत होने का मेरा अधिकार क्यों छीन रहे हैं। प्लीज ऐसा मत करिए। हो सकता है, बेइज्जती मेरी भी सफलता के द्वार खोल दे। आप देख नहीं रहे हैं, भारत में जिसकी जितनी बेइज्जती हो रही है, वह उतनी ही तरक्की कर रहा है। खूब मलाई खा रहा है। आप मुझे मलाई खाने से क्यों रोक रहे हैं?
आप देख नहीं रहे हैं, भारत में जिसकी जितनी बेइज्जती हो रही है, वह उतनी ही तरक्की कर रहा है। कोई बेइज्जती की बदौलत सत्ता में पहुंच गया। बेइज्जत होने वाला हर व्यक्ति मलाई काट रहा है। ऐसे में आप मुझे बेइज्जत होने से क्यों रोक रहे हैं? आखिर मुझे भी तरक्की करने का हक है! मुझे भी मलाई खाने का है!

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