मुख्यपृष्ठनए समाचारओबीसी क्रीमी लेयर पर केंद्र को दो साल नहीं, सिर्फ आठ सप्ताह!

ओबीसी क्रीमी लेयर पर केंद्र को दो साल नहीं, सिर्फ आठ सप्ताह!

-सुप्रीम कोर्ट ने कहा, केवल माता-पिता की आय से नहीं तय होगी पात्रता; यूपीएससी २०२५ के सेवा आवंटन पर भी लागू होगा फैसला
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी की क्रीमी लेयर निर्धारित करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को बड़ी राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने अपने पूर्व फैसले को लागू करने के लिए दो वर्ष का समय मांगने वाली केंद्र की याचिका खारिज कर दी। सरकार को अब आठ सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया गया है। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने स्पष्ट किया कि ओबीसी उम्मीदवार की क्रीमी लेयर स्थिति केवल उसके माता-पिता की आय के आधार पर निर्धारित नहीं की जा सकती। अभिभावकों के पद, सेवा श्रेणी और सामाजिक स्थिति से संबंधित निर्धारित मानदंडों पर भी विचार करना जरूरी है।
वेतन ही क्रीमी लेयर का पैमाना नहीं!
विवाद वर्ष १९९३ के केंद्रीय कार्यालय ज्ञापन और २००४ के स्पष्टीकरण से जुड़ा है। वर्ष १९९३ की व्यवस्था में वेतन तथा कृषि आय के संबंध में अलग-अलग प्रावधान थे। बाद के स्पष्टीकरण से सार्वजनिक उपक्रमों और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के साथ असमान व्यवहार का प्रश्न उठा। सुप्रीम कोर्ट ने ११ मार्च को इस व्यवस्था की व्याख्या करते हुए केवल आय के आधार पर क्रीमी लेयर तय करने को अनुचित माना था। अदालत ने स्पष्ट किया कि सिविल सेवा परीक्षा २०२५ के चयनित ओबीसी उम्मीदवारों का सेवा आवंटन अभी अंतिम नहीं हुआ है। इसलिए उस प्रक्रिया में भी मार्च के फैसले की व्याख्या लागू होगी।
हालांकि, अदालत ने पहले पूरी हो चुकी नियुक्तियों और चयन प्रक्रियाओं को दोबारा खोलने का आदेश नहीं दिया है। पूर्व नियुक्त कर्मचारियों की वरिष्ठता भी इस फैसले से स्वतः प्रभावित नहीं होगी। केंद्र सरकार संविधान और अदालत द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के अनुरूप क्रीमी लेयर संबंधी नीति बना सकती है। यह फैसला सरकारी नौकरियों में आरक्षण की पात्रता तय करने की प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण है। अब केंद्र के सामने आठ सप्ताह में स्पष्ट और समान रूप से लागू होने वाली व्यवस्था सुनिश्चित करने की चुनौती है।

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