-धनुर्धर
पॉलिटिक्स में सबसे मारक चीज होती है एकरसता। वह ले ही डूबती है आदमी को। राजनीति का ही एक बड़ा गुण यह भी है कि इसमें होने से भी ज्यादा अहम होता है दिखना। आप अच्छे हों, इससे ज्यादा जरूरी है कि आप अच्छे दिखें।
दो मोर्चों पर कमजोर
स्मार्ट नेता इन दोनों ही बातों का खास ख्याल रखता है। पिछले पीएम डॉ. मनमोहन सिंह में सौ खूबियां रही हों, इन दोनों मोर्चों पर वह कमजोर साबित हुए। काम के मोर्चे पर उनमें कमी ढूंढना बहुत मुश्किल था। मगर ऐब यह कि पूरा ध्यान करने पर रहता था, दिखने पर ध्यान ही नहीं देते थे। नतीजा यह कि आडवाणी जी के प्रयासों से कमजोर प्रधानमंत्री का टैग उनके साथ हमेशा बना रह गया।
खींच ली थाली
यह अलग बात है कि इन तमाम कोशिशों का फल खुद आडवाणी जी नहीं चख सके। ‘हाथ तो लगाया, मुंह को न आया’ की तर्ज पर आडवाणी जी अपने लिए थाली सजाते रहे और ऐन मौके पर वह थाली मोदी जी ने उनके आगे से खींच ली। मनमोहन सिंह एकरसता का भी शिकार थे। चौबीसों घंटे प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारियों से निपटने में लगे रहते थे। यही नहीं, जैसा सोचते-समझते थे, वैसा ही बोलते थे और फिर वैसा ही करते थे। कोई विविधता नहीं रखते थे।
पर्याप्त विविधता
मोदी जी ने इन सबसे सबक लिया। उन्होंने पहले दिन से यह सुनिश्चित किया कि उनके जीवन में ही नहीं, कथनी और करनी में भी पर्याप्त विविधता रहे। वे जैसा सोचते हैं उससे एकदम अलग बोलते हैं और उससे भी एकदम अलग करते हैं। पीएम की कुर्सी पर बैठने से पहले ही उन्होंने लोगों को विश्वास दिला दिया कि सबके खाते में १५-१५ लाख पहुंचने वाले हैं। ध्यान रहे, उनका ऐसा कोई इरादा नहीं था। किसी के खाते में १५ लाख नहीं पहुंचने वाले थे। साल में दो करोड़ रोजगार भी नहीं मिलने वाला था देश को।
जी बहलाया
इन झूठे वादों ने लोगों का जी बहलाया। लंबे समय तक लोग उम्मीद बांधे रहे। हालांकि, अमित शाह साहब ने जल्दी ही यह रहस्योद्घाटन कर दिया कि कोई उम्मीद-फुम्मीद न पाले। यह वादा नहीं जुमला था। लेकिन अपने देश में लोग इतनी जल्दी खुशफहमी छोड़ दें, ऐसा होता नहीं। सो, लोग आस लगाए रहे कि मोदी जी ने कहा है तो कुछ सोचकर ही कहा होगा।
१५ लाख का ख्याल
बेशक उन्होंने सोचकर ही कहा था। लेकिन यह नहीं सोचा था कि ये वादे पूरे कर देंगे। सोचा था कि लोग इन वादों में उलझे रहेंगे। उन्हें थोड़ा प्लानिंग वगैरह करने का मौका मिलेगा, आपसी चर्चा का स्वाद थोड़ा बढ़ जाएगा, यह ख्याल लंबे समय तक गुदगुदाएगा कि कहीं १५ लाख आ ही गए खाते में तो कितना मजा आएगा। रोजगार वाला मामला तो और मजेदार था।
छुपाने का जतन
मनमोहन राज में इस सबकी बेहद कमी थी। मोदी जी जनता को बोर नहीं होने देते। और कुछ नहीं तो दिन में बारह बार ड्रेस ही बदल लेते हैं। एकरसता नहीं महसूस होने देते किसी को। और नोट कीजिए, जैसे हैं वैसे बिल्कुल नहीं दिखते। अंदर की गैरजिम्मेदारी, मौकापरस्ती, अज्ञानता हालात की वजह से कभी-कभार भले दिख जाएं, उन्हें छुपाए रखने का पूरा जतन वे जी जान से करते हैं। बड़ी से बड़ी गलती सामने आ जाए तो भी उसे स्वीकार नहीं करते हैं। थोड़ी विविधता बनी रहनी चाहिए।
जानते हैं, मानते नहीं
यही देखिए कि पूरा देश जान गया है मोदी जी के राज में चुनाव आयोग तरह-तरह के खेल कर रहा है। मगर, मोदी जी नहीं जानते। सॉर-सॉरी, जानते तो वह भी हैं लेकिन मानते नहीं। उन्हें पता है कि जब तक वे मानते नहीं तब तक बहस इस पर ही होती रहेगी कि उनसे कैसे मनवाया जाए। जैसे ही वह मान लेंगे, उसी क्षण बहस इस पर शुरू हो जाएगी कि उन्हें कितनी और कैसी सजा मिलनी चाहिए।
ओवर स्मार्ट दोस्त
स्मार्ट नेता का टैग उन्होंने यूं ही हासिल नहीं किया है। दुनियाभर के बड़े नेताओं से दोस्ती भी उन्होंने गांठ ली थी कि वक्त जरूरत यह दोस्तियां काम आएं। मगर यहां मार खा गए। जिस दोस्त पर उन्होंने सबसे ज्यादा भरोसा किया था, वह कुछ ज्यादा ही स्मार्ट निकला। जब मोदी जी की दोस्ती उसे युद्ध रुकवाने का क्रेडिट लेने और नोबेल शांति पुरस्कार पाने में खास मदद नहीं कर सकी, तो वह दोस्त की ही जड़ खोदने में लग गया। यह अलग बात है कि उसी दौरान खुद उसकी भी जड़ खुदती जा रही थी। लेटेस्ट सीन यह है कि दोनों ही दोस्त हलाकान हैं। एक को चुनाव नतीजों ने पस्त कर दिया है तो दूसरे पर चुनाव नतीजों को हैंडल करवाने की कवायद भारी पड़ रही है।
