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सिगरेट, तुझको शैतान की कसम-आफताब हसनैन 

*व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित लेख

मैं रोजाना तीस से चालीस सिगरेट पीता था। दिन की शुरुआत भी धुएं से होती थी और अंत भी धुएं पर। हर कोई मुझको समझाता कि “सिगरेट पीना छोड़ दो।” मैं हंसकर टाल देता—“अरे, सिगरेट छोड़ना कौन-सा मुश्किल काम है! जब मन किया, छोड़ दी। यह तो सबसे आसान काम है। मैंने जिंदगी में न जाने कितनी बार सिगरेट छोड़ी है।”
यह बात सुनने में मजाक लगती है, लेकिन असल में यह मेरी कमजोरी का इक़रार था।

यही बात जब मैं अपनी पत्नी से कहता तो वह झुंझलाकर कहती, “आपकी ये सारी बातें थिएटर में अच्छी लगती हैं, जहां की ऑडियंस बस कुछ पल के लिए आपसे जुड़ी रहती है। यह घर है और यहां की ऑडियंस—मैं और आपके बच्चे—पूरी जिंदगी के लिए आपसे जुड़े हैं। खुदा के लिए, खयाली दुनिया से निकलकर हमारे बारे में भी सोचिए। क्यों इस धुएं के जहर से हमें भी मौत के मुंह में ढकेल रहे हैं? क्यों नहीं समझते कि आपके धुएं में हम सब दफन हो रहे हैं?”
मैं सोच में पड़ गया। पहली बार मुझे एहसास हुआ कि धुआं सिर्फ मेरे फेफड़ों में नहीं, घर की दीवारों पर, बच्चों के चेहरों पर और पत्नी की आंखों में भी उतर रहा है। सिगरेट ने सिर्फ मेरी सांसें ही नहीं छीनीं, मेरे रिश्तों को भी धुंधला कर दिया।

मैंने उंगलियों में दबी सिगरेट को राख से भरी ऐशट्रे में दबाने की कोशिश की, मगर अगले ही पल वह अधजली फिर मेरे होंठों से जा लगी। पचास साल का साथ था—इतनी आसानी से कहां छूटता!

पहला कश शायद जिंदगी का सबसे बड़ा धोखा होता है। धुएं का वह पहला गुबार जब सांस के साथ गले से नीचे उतरता है तो लगता है जैसे दिल के खालीपन को भर रहा हो, मगर असल में वह खालीपन और गहरा कर देता है। कॉलेज का जमाना था। दोस्तों के जोर पर हंसते-हंसते मैंने भी एक दिन सिगरेट होंठों से लगा ली। तब नहीं पता था कि लाइटर से सिगरेट में लगाई गई आग, वह आग है जो बुझाए नहीं बुझेगी।

शुरू में सिगरेट महफिल की जरूरत बन गई—दोस्तों की बातों का हिस्सा, शाम के सन्नाटे का बहाना और थकान के बाद सुकून का भ्रम। हर कश के बाद लगता कि मैं अपने गम और दुख धुएं में उड़ा रहा हूं, मगर जल्दी ही समझ आया कि मैं दुख-दर्द नहीं, अपनी सांसें उड़ा रहा हूं।

वक्त बीतता गया। धुएं ने सिर्फ मेरे आसपास ही नहीं, मेरे भीतर भी घर बना लिया। अब वह सिर्फ आदत नहीं, जरूरत, रिश्ता बन गया—जो शरीर से ज्यादा रूह को खोखला करता है। फिर एहसास होने लगा—मैं सिगरेट नहीं पीता, सिगरेट मुझे पी रही है। नतीजा? वही ढाक के तीन पात। वह पीती रही और मैं बुजदिलों की तरह उसके सामने गुलाम बनकर खड़ा रहा, जबकि जरूरत थी जबरदस्त विरोध और आत्मविश्वास की। लड़ना सिगरेट से नहीं, खुद से था; इरादों को मजबूत करना था—जिसमें मैं हमेशा नाकाम रहा। अब तो नया बहाना भी ढूंढ लिया था कि मैं लेखक हूं; जब तक एक हाथ में कलम और दूसरे में सिगरेट न हो, न दिमाग चलता है न कलम। रचनात्मकता का धुआं सिगरेट के धुएं से निकलता है। ईमानदारी से कहूं तो यह सब वहम है—एक खुद तराशा सहारा, जो रचना से ज्यादा विनाश देता है। असली ताकत सोच और दिल में होती है, किसी जलती सिगरेट में नहीं।

मैं रोज खुद से कहता, “बहुत हुआ, आफताब! अब इस बुजदिली से काम नहीं चलेगा। उठ, कमर कस और किसी बहादुर सिपाही की तरह सिगरेट के सामने डट जा।” जोश में आकर मैं जंग का बिगुल बजा देता और ऐलान करता कि कल सुबह से सिगरेट को हाथ भी नहीं लगाऊंगा। लेकिन जैसे ही यह ऐलान करता, मेरे हाथ अपने आप सिगरेट के पैकेट की ओर बढ़ जाते। जंग शुरू होने से पहले ही मैं हथियार डाल देता। एक के बाद एक सिगरेट सुलगाता—“बस आज आखिरी दिन है, कल से नहीं पीऊंगा…” मगर मेरी जिंदगी में वह ‘कल’ कभी नहीं आया, जिसकी सुबह सिगरेट के बिना शुरू होती।

फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि मैं कांप उठा। टीवी पर सरकार की ओर से सिगरेट और तंबाकू के खिलाफ एक विज्ञापन चल रहा था—एक दुबला चेहरा, जिसका गला कैंसर ने खा लिया था। आवाज भारी, टूटी हुई, मगर भीतर तक उतर जाने वाली—“मैं मर रहा हूं, तुम मत मरो।” मेरी सात साल की नातिन सारा भी यह विज्ञापन देखती थी। एक दिन उसने मासूमियत से अपनी अम्मी—यानी मेरी बेटी—से पूछा, “नाना भी बहुत सिगरेट पीते हैं, क्या वो भी कैंसर से मर जाएंगे?”
उस नन्ही जान का यह सवाल मेरे भीतर गूंजता रहा, मेरी हर सांस को झकझोरता रहा—“क्या सच में तुम जिंदा रहना चाहते हो? सिगरेट जिंदगी नहीं देती, सिर्फ मौत की रिहर्सल कराती है।” और फिर… मैं शिद्दत से सिगरेट छोड़ने के बारे में सोचने लगा। ऐसा मैं पहले भी कई बार सोच चुका था—कल से, अगले हफ्ते से, नए साल से; दवा से, नीयत से, दुआ से। सिगरेट छोड़ना जैसे अपने शरीर का एक हिस्सा काट देना हो। हर तरफ से मायूस होकर मैंने सोचना शुरू कर दिया कि अब शायद मौत ही मुझे सिगरेट से आजाद कर पाएगी।

24 मार्च 2020 का दिन था। खबर मिली कि कल से पूरे देश में लॉकडाउन होगा। लॉकडाउन क्या होता है, यह तो लॉकडाउन होने के बाद ही पता चला। उस दिन मेरा सिगरेट का स्टॉक खत्म हो चुका था—एक भी सिगरेट नहीं। मैं बेचैन होकर घर के बाहर गली में निकल आया, शायद कोई दुकान खुली मिल जाए। मगर नजारा ऐसा था जैसे दुनिया खत्म हो चुकी हो। न आदमी, न आदमजाद। जो आवारा कुत्ते गलियों के मालिक बने फिरते थे, वे भी गायब थे। कौए, जो आमतौर पर कां-कां करते रहते हैं, न जाने कहां छिपे थे। हर छोटी-बड़ी दुकान पर ताले लटक रहे थे। फिजा में ऐसा सन्नाटा कि लगता था हवा भी चलने से डर रही हो। कहीं दूर पुलिस जीप का सायरन गूंजता और कहीं कोई पुलिसवाला डंडा लहराकर चिल्लाता—“घर जाओ, बाहर निकलने की इजाजत नहीं है।”
मैं हिम्मत करके एक पुलिसवाले के पास गया और विनती की—“साहब, कहीं से बस एक सिगरेट दिला दीजिए।” उसने मुझे घूरकर देखा और बोला—“अंकल, आप तो सीनियर सिटिजन हैं। क्या आपको भी बताना पड़ेगा कि सिगरेट पीना हानिकारक है? घर जाइए, नहीं तो राउंडअप पुलिस उठा लेगी।” मैं ‘पुलिस उठा लेगी’ का मतलब अच्छी तरह जानता था, इसलिए चुपचाप पलट गया।

सिगरेट न मिलने की मायूसी और तलब ने दिमाग सुन्न कर दिया था। सच है—सिगरेट पीने वालों की रगों में खून की जगह निकोटीन दौड़ती है। उस वक्त मुझे निकोटीन के एक डोज की शिद्दत से जरूरत थी। हालत यह थी कि अगर कूड़े के ढेर में भी सिगरेट का कोई टुकड़ा दिखाई दे जाता, तो उसे उठाकर जला लेता। न जाने क्यों उस दिन सिगरेट आदत नहीं, जिंदगी की आखिरी जरूरत लग रही थी।

मैं बेचैनी में चलता रहा। अचानक आसमान की ओर देखा और दुआ की—“ऐ अल्लाह, बस एक सिगरेट दे दे। मैं वादा करता हूं, फिर कभी नहीं पीऊंगा।” अभी कुछ ही कदम आगे बढ़ा था कि पांव किसी चीज से टकराया। जमीन पर सिगरेट का एक पैकेट पड़ा था। पहली नजर में खाली लगा, झुंझलाकर मैंने उसे जोर से लात मारी। पैकेट कुछ दूर चला गया। फिर जैसे हवा ने फुसफुसाया—“उठा लो, यह तुम्हारे लिए है!”
मैं झुका—दिल धड़क रहा था, हाथ कांप रहे थे। पैकेट उठाकर खोला तो हैरानी की हद न रही—वह पूरा भरा हुआ था, हर सिगरेट अपनी जगह! बिल्कुल नया पैकेट, जैसे किसी ने मेरे लिए भेजा हो। आंखों में खुशी के आंसू आ गए—“यह तो किसी चमत्कार से कम नहीं!” मैं आसमान की ओर देखने लगा, जैसे उस छुपे हाथ को ढूंढ रहा हूं जिसने यह चमत्कार दिया। सड़क खाली थी, हवा खामोश—मगर दिल में नया हौसला और जज्बा जाग उठा। पैकेट जेब में रखकर तेज कदमों से घर की ओर बढ़ा।

रास्ते भर मेरे भीतर अजीब जंग चलती रही—नेकी और बुराई की, जमीर और शैतान की।
एक आवाज कहती—“यह अल्लाह की बख्शिश है, ख्वाहिश पूरी कर लो।”
दूसरी आवाज पुकारती—“यह धोखा है, इम्तिहान है, शैतान का फेंका जाल है—वक्त रहते इससे बच जाओ!”

घर पहुंचा तो पत्नी ने दरवाजा खोला। मैंने सिगरेट से भरा पैकेट उसके सामने रखकर सारी कहानी सुना दी। वह कुछ देर मेरी आंखों में देखती रही, फिर बोली—“शायद यह खुदा ने नहीं, शैतान ने भेजा है—आपको अपने जाल में फंसाए रखने के लिए। अब देखना है, आप किसकी सुनते हैं।”
मैं थोड़ी देर खड़ा सोचता रहा। फिर धीरे से पैकेट खोला, एक सिगरेट निकाली और लाइटर से पूरी सिगरेट जला दी। फिर दूसरी, तीसरी—आखिरकार पूरा पैकेट जला कर राख कर दिया। हर जलती सिगरेट के साथ मेरे भीतर की आग ठंडी होती गई।

उस पल लगा जैसे सीने से कोई बोझ उतर गया हो। धुआं खत्म हो गया था और फिजा में एक अजीब-सी खुशबू फैल गई—नई सांस की खुशबू। मैंने राख की ओर देखकर कहा—“सिगरेट तू बुराई है, और बुराई का अल्लाह से क्या वास्ता! इसलिए तुझको अल्लाह की नहीं, शैतान की कसम—मेरी सुकूनभरी जिंदगी में फिर कभी लौटकर मत आना।”

अब जब किसी के मुंह से सिगरेट का धुआं निकलता देखता हूं, तो लगता है जैसे मैं खुद को अतीत में जलते देख रहा हूं। मैं खामोशी से सांस लेता हूं और उस खामोश सांस में शुक्र अदा करता हूं कि मैं अब भी जिंदा हूं। धुआं अब सिर्फ हवा में है, मेरे भीतर नहीं।

आखिर में एक बच्चे का जिक्र करना चाहूंगा। बारह साल की उम्र में उस बच्चे ने सिगरेट पर एक शेर लिखा था, जो उसकी स्कूल मैगजीन में छपा—

“सिगरेट नहीं जलती, जलती है जीवन की ज्योत
हर कश के बाद कुछ और करीब आ जाती है मौत।”

वह बच्चा मैं ही था—आपका आफताब हसनैन। अच्छा हुआ मैंने सिगरेट छोड़ दी, वरना लोग कहते—“इस शेर का शायर सिगरेट पी-पीकर मर गया!”

 

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