मुख्यपृष्ठस्तंभदूध का दावा, ‘एनर्जी’ का खेल!

दूध का दावा, ‘एनर्जी’ का खेल!

उमन गुप्ता
देश के बाजार में नाम बड़ा हो तो क्या दावे भी जांच से बाहर हो जाते हैं? खाद्य नियामक एफएसएसएआई की कार्रवाई ने इस सवाल को फिर सामने ला दिया है। पतंजलि के दूध बिस्किट, किंडर जॉय तथा रेड बुल, स्टिंग समेत कई लोकप्रिय पेय उत्पादों की लेबलिंग और दावों को लेकर नियामक की आपत्तियों ने खाद्य बाजार की चमकदार पैकेजिंग के पीछे छिपे सवालों को उजागर किया है।
सबसे ज्यादा चर्चा ‘एनर्जी ड्रिंक’ के नाम पर बिकने वाले उत्पादों को लेकर है। रेड बुल, स्टिंग, मॉन्स्टर, हेल, एड्रेनालिन रश और वैंâपा एनर्जी जैसे ब्रांडों को लेकर एफएसएसएआई की ओर से गलत लेबलिंग और ‘एनर्जी ड्रिंक’ संबंधी दावों पर नोटिस दिए जाने की रिपोर्ट सामने आई है। सवाल सीधा है कि जब किसी उत्पाद को ‘एनर्जी’ के नाम से बाजार में उतारा जाता है, तो उपभोक्ता उसके नाम और पैकेजिंग से जो धारणा बनाता है, उसकी जिम्मेदारी किसकी है?
बच्चों के उत्पाद पर सवाल तो चिंता और ब़ड़ी
किंडर जॉय जैसे उत्पाद सीधे बच्चों को आकर्षित करते हैं। ऐसे में पोषण संबंधी दावों और लेबलिंग को लेकर नियामक की आपत्ति को हल्के में नहीं लिया जा सकता। पतंजलि के दूध बिस्किट को लेकर भी लेबलिंग और दावों पर सवाल उठे हैं। यहां मामला केवल किसी कंपनी की छवि का नहीं है। मामला उस माता-पिता के भरोसे का है, जो पैकेट पर लिखी जानकारी देखकर अपने बच्चे के लिए उत्पाद चुनता है।
सिर्फ नोटिस से खत्म होगा मामला?
एफएसएसएआई के पास नियमों के उल्लंघन की स्थिति में कार्रवाई करने और खाद्य उत्पादों को वापस लेने की व्यवस्था है। लेकिन असली परीक्षा अब आगे है। यदि नियामक को किसी उत्पाद की पैकेजिंग या दावे में गड़बड़ी मिली है तो क्या संबंधित उत्पादों की बाजार में उपलब्धता की व्यापक जांच होगी?

सबसे बड़ा सवाल
बड़े ब्रांडों के विज्ञापन लाखों-करोड़ों उपभोक्ताओं तक पहुंचते हैं। आम ग्राहक के पास न प्रयोगशाला है, न पोषण विशेषज्ञ। वह पैकेट पर लिखी जानकारी और सरकारी नियमन पर भरोसा करता है इसलिए एफएसएसएआई की कार्रवाई केवल कंपनियों के लिए चेतावनी नहीं, बल्कि नियामक व्यवस्था के लिए भी कसौटी है। ब्रांड कितना भी बड़ा हो, ‘दूध’, ‘पोषण’ या ‘एनर्जी’ जैसे शब्दों के साथ उपभोक्ता के भरोसे से खिलवाड़ की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।

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