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मेट्रो-९ कारशेड के लिए १२,४०० पेड़ों की कटाई शुरू…सरकार की क्रूरता के खिलाफ ‘मानव शृंखला’ आंदोलन!

-शहीद मे. कौस्तुभ राणे की मां भी हुईं शामिल…खटखटाएंगे कोर्ट का दरवाजा

सुरेश गोलानी / मुंबई

राज्य सरकार द्वारा भायंदर के डोंगरी स्थित प्राकृतिक पहाड़ी पर कार्यान्वित की जा रही मेट्रो कार शेड परियोजना के खिलाफ रविवार (६ जुलाई) को उत्तन में नागरिकों ने बारिश के बावजूद विशाल ‘मानव श्रृंखला’ बनाकर शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन कर अपना विरोध जताया। ज्ञात हो कि पर्यावरण प्रेमी और स्थानीय लोगों के तीव्र विरोध के बावजूद एमएमआरडीए द्वारा नियुक्त ठेकेदारों ने इस परियोजना के लिए १२,४०० से अधिक पेड़ों की कटाई का काम शुरू कर दिया है।
इसके विरोध में हाथों में काले झंडे व पर्यावरण और संरक्षण संबंधित स्लोगन लिखी तख्तियां लेकर पर्यावरण प्रेमी, सामाजिक और मच्छीमार संगठनों से जुड़े वॉलंटियर्स, विभिन्न राजनैतिक पक्षों के कार्यकर्ताओं के अलावा महिलाएं, बुजुर्ग, छोटे बच्चे और युवा विद्यार्थी हजारों की संख्या में सुबह ९ से ११ के बीच इस मानव शृंखला में शामिल हुए। इसके अलावा मुंबई और आस-पास स्थित २१ जगहों पर पर्यावरण प्रेमियों ने विरोध प्रदर्शन कर उत्तन में आयोजित मानव शृंखला को अपना समर्थन दिया।
आंदोलन में शामिल शहीद मेजर कौस्तुभ राणे की मां ज्योति राणे, जिन्होंने पहले भी निर्धार प्रतिष्ठान के माध्यम से अवैध पेड़ों की कटाई के खिलाफ सरकार को अपना व्यक्तिगत निवेदन दिया है। उन्होंने कहा, ‘इस आंदोलन को जो उत्स्फूर्त प्रतिसाद मिला है, वो इस बात का संकेत है कि प्रशासन द्वारा लिया गया ये प्रकृति विरोधी कदम नागरिकों पर कितना अन्यायकरक है। स्थानीय मच्छीमार नेता बर्नड डिमेलो के अनुसार, अगर पहाड़ पर मौजूद हजारों पेड़, जो प्रदूषण को कम करने का आधार हैं, नष्ट हो गए तो यहां रहने वाले लोगों का जीना और भी कठिन हो जाएगा।
पूर्व नगरसेविका शर्मिला बागाजी ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा ‘अगर सरकार ने कार शेड को कहीं और शिफ्ट नहीं किया तो हमारा आंदोलन अधिक तीव्र होगा और इंसाफ के लिए कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया जाएगा।’ सभी आंदोलनकारियों का मुख्य रूप से एक ही सुर था कि पेड़ों की कटाई से न सिर्फ पूरे शहर में रहने वाले लाखों नागरिकों के लिए ऑक्सीजन का मुख्य स्रोत खत्म हो जाएगा, बल्कि विस्फोटकों से पहाड़ उड़ाए जाने से जैव विविधता, औषधीय पौधे, हजारों दुर्लभ और संरक्षित पक्षी, जानवरों की विभिन्न प्रजातियां बेघर एवं नष्ट हो जाएंगे। इसके अलावा सरकार के इस अमानवीय पैâसले से पहाड़ों में प्राकृतिक जलधाराओं, झरनों और कृषि पर निर्भर स्थानीय ग्रामीणों द्वारा बनाए गए छोटे बांधों के तबाह होने का खतरा भी मंडरा रहा है।

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