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हिमालय में मौत की सुरंगे

प्रमोद भार्गव
हिमालय के देश नेपाल में एक बड़े हिमखंड के टूटने से आई जानलेवा बाढ़ की चपेट में सैंकड़ों लोगों की मौत और हजारों लोगों के लापता होने के बाद, अब एक नई चुनौती पेश आई है। यहां की निर्माणाधीन जल विद्युत परियोजनाओं के लिए बनाई जा रही सुरंगों में ९३३ लोगों के फंसें होने की खबर हैं। रासुवा और नुवाकोट जिलों की ९ सुरंगों में ये लोग जीवन-मृत्यु के झंझावत से जूझ रहे है। मलबे और कीचड़ सुरंगों में भर जाने से मार्ग बंद होने के कारण बचाव अभियान चलाना मुष्किल हो रहा है। नेपाल के १० हजार सुरक्षाकर्मी और अन्य राहतकर्मी सुरंगों तक पहुंचने की कड़ी मशक्कत कर रहे हैं। त्रिशूली ३-ए परियोजना की सुरंग में करीब ४० लोग फंसे हैं, जिन्हें बचाने के लिए भारत का ११ सदस्यीय सुरक्षा दल जी-जान एक किए हुए है। चीन भी त्रिशूली-३-बी सुरंग परियोजना में फंसे लोगों को निकालने में लगा है। भारत ही वह देश है, जिसने इस संकट की घड़ी में नेपाल को बड़ी मात्रा में खाद्य और चिकित्सा सामग्री उपलब्ध कराई है।
समूचे हिमालय क्षेत्र में बीते एक दशक से पर्यटकों के लिए सुविधाएं जुटाने के परिप्रेक्ष्य में चीन, भारत और नेपाल में जल विद्युत संयंत्र और रेल परियोजनाओं की बाढ़ आई हुई है। इन योजनाओं के लिए हिमालय क्षेत्र में रेल गुजारने और कई हिमालयी छोटी नदियों को बड़ी नदियों में डालने के लिए सुरंगें निर्मित की जा रही हैं। बिजली परियोजनाओं के लिए भी जो संयंत्र लग रहे हैं, उनके लिए हिमालय को खोखला किया जा रहा है। इस आधुनिक औद्योगिक और प्रौद्योगिकी विकास का ही परिणाम है कि आज हिमालय ही नहीं, हिमालय के शिखरों पर स्थित हिमखंड बड़ी संख्या में दरकने लगे हैं। इन पर हजारों साल से मानव बसाहटें अपने ज्ञान-परंपरा के बूते जीवन-यापन करने के साथ हिमालय और वहां रहनेवाले अन्य जीव-जगत की भी रक्षा करते चले आ रहे हैं। हिमालय और पृथ्वी सुरक्षित बने रहें, इस दृष्टि से कृतज्ञ मनुष्य ने अथर्ववेद में लिखे पृथ्वी-सूक्त में अनेक प्रार्थनाएं की हैं। यह सूक्त राश्ट्रीय आवधारणा एवं वसुधैव कुटूम्कम् की भावना को विकसित, पोशित एवं फलित करने के लिए मनुष्य को नीति और धर्म से बांधने की व्यावहारिक कोशिशें हैं। लेकिन हमने कथित भौतिक सुविधाओं के लिए अपने आधार को ही नष्ट करने का काम आधुनिक विकास के बहाने कर दिया है। परिणामस्वरूप हिमालय में निर्माणाधीन क्षेत्रों में आपदाएं आने का सिलसिला निरंतर बना हुआ है।
उत्तराखंड के चमोली जिले में आनेवाले जोशीमठ शहर ने कई अप्रिय कारणों से नीति-नियंताओं का ध्यान अपनी ओर खींचता है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा जारी उपग्रह तस्वीरों से जोशीमठ के ५.४ सेंटीमीटर हिमालय के गर्भ में धंस जाने की चिंता जताई है। सिमटती धरती की इन प्रामाणिक सच्चाइयों को छिपाने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और उत्तराखंड सरकार ने अंतरिक्ष एजेंसी समेत कई सरकारी संस्थानों को निर्देश दिया है कि वे मीडिया के साथ जानकारी साझा न करे। नतीजतन, इसरो की वेबसाइट से धरती के धंसने के चित्र हटा दिए गए। सरकार का यह उपाय भूलों से सबक लेने की बजाय उन पर धूल डालने जैसा है। जब हिमालय का पारिस्थितिकी तंत्र ने धरती को हिलाकर नाजुक बना दिया है और घरों में दरारें पड़ने के साथ आधारतल घंस रहा है, तब लोगों को जीवन-रक्षा से जुड़ी सच्चाईयों को क्यों छुपाया जा रहा है ? दरअसल, भारत सरकार और राज्य सरकार ने स्थानीय लोगों के विरोध के बावजूद हठपूर्वक पर्यावरण के विपरीत जिन विकास योजनाओं को चुना है, उनके चलते यदि लोग अपने गांव और आजीविका के संसाधनों को खो रहे हैं, तो ऐसी परियोजनाएं किसलिए और किसके लिए?
उत्तराखंड में गंगा और उसकी सहयोगी नदियों पर एक लाख तीस हजार करोड़ की जल विद्युत परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। इन संयंत्रों की स्थापना के लिए लाखों पेड़ों को काटने के बाद पहाड़ों को निर्ममता से छलनी किया जा रहा है और नदियों पर बांध निर्माण के लिए बुनियाद हेतु गहरे गड्ढे खोदकर खंबे व दीवारें खड़े किए जाते हैं। कई जगह सुरंगे बनाकर पानी की धार को संयंत्र के पंखों पर डालने के उपाय किए गए हैं। इन गड्ढों और सुरंगों की खुदाई में ड्रिल मशीनों से जो कंपन होता है, वह पहाड़ की परतों की दरारों को खाली कर देता है और पेड़ों की जड़ों से जो पहाड़ गुंथे होते हैं, उनकी पकड़ भी इस कंपन से ढीली पड़ जाती है। नतीजतन तेज बारिश के चलते पहाड़ों के ढहने और हिमखंडो के टूटने की घटनाएं पूरे हिमालय क्षेत्र में लगातार बढ़ जाती हैं। यही नहीं कठोर पत्थरों को तोड़ने के लिए भीशण विस्फोट भी किए जाकर हिमालय को हिलाया जा रहा है। गोया, प्रस्तावित सभी परियोजनाएं कालांतर में अस्तित्व में लाए जाने के उपाय जारी रहते हैं तो हिमालय का क्या हश्र होगा, कहना मुश्किल है ?
हिमालय में अनेक रेल परियोजनाएं भी निर्माणाधीन है। सबसे बड़ी रेल परियोजना उत्तराखंड के चार जिलों (टेहरी, पौड़ी, रुद्रप्रयाग और चमोली) के तीस से ज्यादा गांवों को भी विकास की कीमत चुकानी पड़ रही है। छह हजार परिवार विस्थापन के दायरे में आ गए हैं। रुद्रप्रयाग जिले के मरोड़ा गांव के सभी घर दरक गए है। रेल विभाग ने इनके विस्थापन की तैयारी कर ली है। यह तो शुरुआत है, लेकिन ये विकास इसी तरह जारी रहते हैं तो बर्बादी का नक्शा बहुत विस्तृत होगा। दरअसल, ऋशिकेश से कर्णप्रयाग रेल परियोजना १२५ किमी लेगी है। इसके लिए सबसे लंबी सुरंग देवप्रयाग से जनासू तक बनाई जा रही है, जो १४.८ किमी लंबी है। केवल इसी सुरंग का निर्माण बोरिंग मशीन से किया जा रहा है। बांकी जो १५ सुरंगे बन रही हैं, उनमें ड्रिल तकनीक से बारूद लगाकर विस्फोट किए जा रहे हैं। इस परियोजना का दूसरा चरण कर्णप्रयाग से जोशीमठ के बजाय अब पीपलकोटी तक होगा। भू-गर्भीय सर्वेक्षण के बाद रेल विकास निगम ने जोशीमठ क्षेत्र की भौगोलिक संरचना को परियोजना के अनुकूल नहीं पाया था। इसलिए अब इस परियोजना का अंतिम पड़ाव पीपलकोठी कर दिया है। जो एक अच्छी पहल है।
दरअसल उत्तराखंड के भूगोल का मानचित्र बीते डेढ़ दशक में तेजी से बदला है। चौबीस हजार करोड़ रुपए की ऋशिकेश-कर्णप्रयाग १२५ किमी लंबी रेल परियोजना ने जहां विकास और बदलाव की ऊंची छलांग लगाई है, वहीं इन योजनाओं ने खतरों की नई सुरंगे भी खोल दी है। उत्तराखंड के सबसे बड़ी पहाड़ी शहर श्रीनगर के नीचे से भी सुरंग निकल रही है। नतीजतन धमाकों के चलते १५० से ज्यादा घरों में दरारें आ गई है। पौड़ी जिले के मलेथा, लक्ष्मोली, स्वोत और डेवली में ७७१ घरों में दरारें आ चुकी है। रेल परियोजनाओं के अलावा यहां बारह हजार करोड़ रुपए की लागत से बारहमासी मार्ग निर्माणाधीन हैं। इन मार्गों पर पुलों के निर्माण के लिए भी सुरंगें बनाई जा रही हैं, तो कहीं घाटियों के बीच पुल बनाने के लिए मजबूत आधार स्तंभ बनाए जा रहे हैं। हालांकि, ये सड़कें सेना के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। सैनिकों का हिमालयी क्षेत्र में इन सड़कों के बन जाने से चीन की सीमा पर पहुंचना आसान हो गया है। लेकिन पर्यटन को बढ़ावा देने के लिहाज से जो निर्माण किए जा रहे हैं, उन पर पुनर्विवार की जरूरत है।
हिमालय में हाल ही में केन-बेतवा नदी जोड़ों अभियान की तर्ज पर उत्तराखंड में देश की पहली ऐसी परियोजना पर काम शुरू हो गया है, जिसमें हिमनद (ग्लेशियर) की एक धारा को मोड़कर बरसाती नदी में पहुंचाने का प्रयास हो रहा है। यदि ये यह परियोजना सफल हो जाती है तो पहली बार ऐसा होगा कि किसी बरसाती नदी में सीधे हिमालय का बर्फीला पानी बहेगा। हिमालय की अधिकतम ऊंचाई पर नदी जोड़ने की इस महापरियोजना का सर्वेक्षण शुरू हो गया है। इस परियोजना की विशेशता है कि पहली बार उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल की एक नदी को कुमाऊं मंडल की नदी से जोड़कर बड़ी आबादी को पानी उपलब्ध कराया जाएगा। यही नहीं एक बड़े भू-भाग को सिंचाई के लिए भी पानी मिलेगा। ‘जल जीवन मिशन‘ के अंतर्गत इस परियोजना पर काम किया जा रहा है। लेकिन इस परियोजना के क्रियान्वयन के लिए जिस सुरंग का निर्माण कर पानी नीचे लाया जाएगा, उसके निर्माण में हिमालय के शिखर-पहाड़ों को खोदकर सुरंगों एवं नालों का निर्माण किया जाएगा, उनके लिए ड्रिल मशीनों से पहाड़ों को छेदा जाएगा और विस्फोट से पहाड़ों को शिथिल किया जाएगा। यह स्थिति हिमालयी पहाड़ों के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए नया बड़ा खतरा साबित हो सकती है? हिमालय में चीन ब्रह्मपुत्र नदी पर बड़े बांध के निर्माण में लगा है। यह बांध हिमालय के लिए तो संकट है ही, यदि कोई दुर्घटना होती है तो नेपाल, भारत के पूर्वोत्तर के क्षेत्र और बांग्लादेश को भी ये बांध खतरे में डाल सकते हैं। बांध, सुरंगे, रेल एवं जल विद्युत परियोजनाएं हिमालय में बाढ़, भू-स्खलन और केदरनाथ एवं नेपाल जैसी प्रलय की आपदाओं के लिए खुला आमंत्रण हैं।

लेखक, साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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