मुख्यपृष्ठस्तंभदेस दुनिया: असली विलेन कौन?

देस दुनिया: असली विलेन कौन?

मनमोहन सिंह

वैश्विक बिसात पर शैतानी चालें और ‘शांति’ की नौटंकी!

दुनिया के नक्शे पर इस वक्त जो इंटरनेशनल ड्रामा चल रहा है, उसे देखकर तो यही लगता है कि सुपरपावर देशों ने पूरी दुनिया को एक बड़े कसीनो में तब्दील कर दिया है। लेबनान और गाजा में बारूद बरस रहा है, मासूमों की जान जा रही है, और पर्दे के पीछे बैठे ठेकेदार अपनी-अपनी स्ट्रैटेजिक पोजीशन सेट करने में मसरूफ हैं। ईरान ने अमेरिका से बैकचैनल बातचीत क्या रोकी, मानो महाशक्तियों की डिप्लोमेसी का लव लेटर ही फट गया। अब सवाल उठता है कि इस महायुद्ध की स्क्रिप्ट का असली विलेन कौन है?
अगर आप इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को देखते हैं, तो वो साफ तौर पर फ्रंट-फुट पर खेल रहे विलेन नजर आते हैं। १६ अप्रैल को सीजफायर यानी युद्धविराम का एलान होता है, और उसके तुरंत बाद दक्षिणी लेबनान में बॉम्बिंग और तेज हो जाती है। हद तो तब हो गई जब इजरायली फौज लितानी नदी पार करके ९०० साल पुराने ऐतिहासिक ब्यूफोर्ट किले पर कब्जा जमा लेती है। रक्षा मंत्री इजरायल कात्ज हुंकार भर रहे हैं कि हिजबुल्लाह को कुचल कर ही दम लेंगे। सीजफायर के नाम पर ऐसी ‘शांति’ तो शायद इतिहास ने पहले कभी नहीं देखी होगी!
दूसरी तरफ ईरान और उसके रेजिस्टेंस ग्रुप्स हैं। ईरान ने अपनी अर्ध-सरकारी एजेंसी तसनीम के जरिए साफ कह दिया है कि जब तक इजरायल पीछे नहीं हटता, अमेरिका से कोई बात नहीं होगी। लेकिन इसके साथ ही ईरान ने जो धमकी दी है, वो दुनिया का ब्लड प्रेशर बढ़ाने वाली है। होर्मुज स्ट्रेट और बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य जैसे इंटरनेशनल ऑयल सप्लाई रूट को बंद करने की चेतावनी देना वैसा ही है, जैसे मोहल्ले की लड़ाई में कोई पूरे शहर की बिजली काटने की धमकी दे दे। अगर तेल की सप्लाई रुकी, तो ग्लोबल मार्केट में हाहाकार मचना तय है। यानी एक तरफ बारूद का विलेन है, तो दूसरी तरफ दुनिया की नब्ज दबाने की तैयारी कर रहा विलेन।
अब आते हैं उस तीसरे कोण पर जो खुद को मसीहा कहता है, यानी फ्रांस और अमेरिका। फ्रांस ने आनन-फानन में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की इमरजेंसी मीटिंग बुला ली है। यह वही संयुक्त राष्ट्र है जिसकी बैठकें अक्सर कड़े शब्दों में निंदा प्रस्ताव पास करने और चाय-बिस्कुट खाने से ज्यादा कुछ नहीं कर पातीं। वहीं अमेरिका महाशय हैं, जो एक हाथ से इजरायल को लीथल वेपन्स यानी घातक हथियार सप्लाई करते हैं और दूसरे हाथ से डैमेज कंट्रोल का सफेद झंडा लहराते हैं। यह तो वही बात हुई कि आग भी हम ही लगाएंगे और फायर ब्रिगेड का नंबर भी हम ही घुमाएंगे!
रणनीतिक उठा-पटक का कड़वा सच यह है कि इस पूरी बिसात पर असली विलेन कोई एक चेहरा नहीं है, बल्कि वह ग्लोबल हिपोक्रेसी यानी वैश्विक पाखंड है जो शांति के नाम पर हथियारों की दुकानें चलाता है।
चौधराहट को बचाए रखने का शैतानी लालच
हिजबुल्लाह ने दावा किया है कि उसने नहारिया पर रॉकेट दागकर २१ मिलिट्री ऑपरेशन्स किए, इजरायल कहता है कि वह आत्मरक्षा कर रहा है, ईरान कहता है कि वह न्याय कर रहा है, और फ्रांस-अमेरिका कहते हैं कि वे मध्यस्थता कर रहे हैं। इस खेल के पीछे कोई माइंडसेट या मानवता नहीं है, बल्कि सिर्फ जमीन, तेल के रूट और अपनी चौधराहट को बचाए रखने का शैतानी लालच है। तमाशा यह है कि जब तक दुनिया यूएनएससी की बैठकों में ‘गंभीर चिंता’ जताती रहेगी, तब तक असली विलेन वातानुकूलित कमरों में बैठकर नक्शों पर नई लकीरें खींचते रहेंगे और जमीन पर आम इंसान इस बारूद की कीमत चुकाता रहेगा।

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