पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के नतीजे आते ही तुरंत ‘खेला होबे’ हो गया है। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस की अप्रत्याशित हार हुई। ममता बनर्जी खुद अपने भवानीपुर निर्वाचन क्षेत्र से हार गर्इं, लेकिन इसके बाद ममता बनर्जी की तृणमूल पार्टी को विधानसभा और लोकसभा में पूरी तरह से तोड़ दिया गया। कोई ऋतव्रत बनर्जी नाम के युवा विधायक के नेतृत्व में ६० विधायकों ने बगावत कर दी (जैसा कि तब महाराष्ट्र में हुआ था) और उसने विधानसभा में दावा किया कि हमारी ही तृणमूल पार्टी असली है। ममता बनर्जी के पास अब २० विधायक बचे हैं। उनमें से भी आधे टूटने के कगार पर हैं। पहले बंगाल की सत्ता हाथ से गई और तुरंत बाद खुद खड़ी की हुई पार्टी भी हाथ से निकल गई, वह भी एक ऐरे-गैरे के कारण। महाराष्ट्र में शिवसेना और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस के मामले में भाजपा ने यही किया। शिवसेना पार्टी और ‘धनुष-बाण’ का चुनाव चिह्न किसी एक पिट्ठू (मिंधे) को सौंप दिया और शरद पवार के जीते जी, उन्हीं की बनाई हुई पार्टी को उनकी आंखों के सामने अजीत पवार के हवाले कर दिया। ममता बनर्जी को भी अब इसी स्थिति का सामना करना पड़ेगा। पश्चिम बंगाल विधानसभा में भाजपा का बहुमत है और विधानसभा अध्यक्ष दो दिन पहले ही दिल्ली का दौरा करके मोदी-शाह से मिलकर आए हैं इसलिए विधानसभा में दलबदल विरोधी कानून पर सिर पीटने का कोई फायदा नहीं है। जो महाराष्ट्र ने झेला, वही बंगाल में भी होगा। चुनाव आयोग मोदी-शाह के गुनाहों का ‘पार्टनर’ है और सुप्रीम कोर्ट उनके घरेलू नौकर की तरह बर्ताव कर रहा है इसलिए जो शिवसेना-राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ हुआ, न्याय के लिए ममता बनर्जी को भी उसी कतार में खड़ा होना पड़ेगा। भारतीय धरती पर राजनीति का जो घिनौना खेल चल रहा है, यह उसका भयानक रूप है। पहले महाराष्ट्र और अब
पश्चिम बंगाल के चुनाव
सीधे रास्ते से नहीं जीते गए। चुनाव जीतने के बाद भाजपा ने क्षेत्रीय पार्टियों के विधायकों को तोड़ा। देश की दिशा सिर्फ ‘एक ही पार्टी, एक चुनाव’ की तरफ बढ़ रही है। क्षेत्रीय पार्टियों का कोई स्थान न रहे और राज्यों की आवाज पूरी तरह से दबा दी जाए, यह साजिश चिंताजनक है। सत्ता का असीमित दुरुपयोग, पैसे का खेल और दहशतगर्दी के जरिए चुनावों को अपने कब्जे में लेना और सत्ता पर बने रहना, यह लोकतंत्र का एक नया तंत्र भारत में पैदा हुआ है। किसी एक पार्टी के चिह्न पर चुनकर आए विधायकों-सांसदों को सीधे खरीद लेना और ‘वॉशिंग मशीन’ में डालकर पवित्र कर देना, इस धंधे को प्रधानमंत्री मोदी ने मानो कानूनी मान्यता दे दी है। जिसके नेतृत्व में तृणमूल के ६० विधायक ‘बगावत’ कर रहे हैं, वह ऋतव्रत बनर्जी कौन है? बमुश्किल ३५ साल का यह लड़का पहले पश्चिम बंगाल की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) में था। वहां उसने घोटाले किए। फिर वह तृणमूल में आया। ममता बनर्जी ने उसे राज्यसभा भेजा और अब विधानसभा में चुनकर लार्इं। वह कहता है, ‘मैं ही तृणमूल का मालिक हूं’ और भाजपा विधानसभा में इसे स्वीकार कर रही है। यह अमित शाह का बोया हुआ जहर है। चुनकर आए विधायक टूट गए, इसलिए ममता बनर्जी तृणमूल पार्टी की नेता नहीं रहीं, ऐसा सोचना और उस बागी गुट को तृणमूल के रूप में मान्यता देना सरासर भ्रष्टाचार है। लेकिन महाराष्ट्र में भी इसी तरह से ‘महतारी’ को मारा गया। वही बुरा दौर अब पश्चिम बंगाल पहुंच चुका है। बुरा वक्त हावी हो चुका है, यही सच है। महाराष्ट्र से पहले बिहार में चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी, पंजाब में अकाली दल और केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को भाजपा ने
इसी ‘पैटर्न’ से
तोड़ डाला। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी कहते हैं, ‘राज्य में कानून का राज शुरू हो गया है।’ तृणमूल कांग्रेस के विधायकों को तोड़कर जश्न मनाना, क्या कानून के राज में आता है? तृणमूल के सांसदों पर हमले करना, इसे कानून का राज कैसे कहा जाए? विधानसभा के अध्यक्ष को निष्पक्ष होना चाहिए, लेकिन महाराष्ट्र के फैसले में विधानसभा अध्यक्ष ने पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया। पश्चिम बंगाल में भी वही नजारा दिखेगा। मोदी-शाह ने देश के लोकतंत्र को एक तरह से ग्रहण लगा दिया है। पार्टी तोड़ने और गलत तरीकों से सत्ता पर टिके रहने का नशा खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। ममता बनर्जी के राज में कुछ गलतियां हुई होंगी, लेकिन इसलिए उनकी पार्टी को इस तरह से नीलाम करने का अधिकार किसी को नहीं है। ममता बनर्जी मुस्लिम-परस्त (तुष्टिकरण करने वाली) थीं, इसलिए उनकी हार हुई, भाजपा का यह विश्लेषण सही नहीं है। अब भाजपा का राज पश्चिम बंगाल में आ गया है, इसे पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी को श्रद्धांजलि बताना हिंदुत्व और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का मजाक उड़ाना है। श्यामा प्रसाद बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार में शामिल थे। स्वतंत्रता संग्राम के ‘भारत छोड़ो’ जैसे आंदोलन का उन्होंने विरोध किया था और इस आंदोलन को बेरहमी से कुचल देने के लिए उन्होंने ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखा था। इसलिए भाजपा का पश्चिम बंगाल में अपनी सरकार को पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी को समर्पित करना हिंदुत्व को शोभा नहीं देता। दूसरी बात यह है कि सरकार आते ही पश्चिम बंगाल में भाजपा ने गायों को काटने (गो-वध) की अनुमति दे दी और यह कानूनी मान्यता है। अगर भाजपा का यह दावा है कि ममता बनर्जी की सरकार मुसलमान-परस्त थी तो भाजपा की सरकार भी हिंदुत्ववादी और संस्कृति के अनुकूल नहीं है। उनकी सरकार चोरियां करके आई है और सत्ता बचाने के लिए वह अब दूसरी पार्टियों पर डवैâती डाल रही है। भारतीय लोकतंत्र की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। इन उड़ती हुई धज्जियों को आखिर कब तक देखते रहना पड़ेगा?
