मुख्यपृष्ठसंपादकीयसंपादकीय : फ्रांस सुलग उठा...भारत में भीतर ही भीतर उबाल!

संपादकीय : फ्रांस सुलग उठा…भारत में भीतर ही भीतर उबाल!

फ्रांस के हालात बिल्कुल भारत जैसे हो गए हैं। महंगाई, बेरोजगारी और सार्वजनिक सेवाओं की बदहाली से तंग आकर `फ्रेंच’ जनता सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रही है। वहां के गृह मंत्रालय ने माना है कि स्थिति नियंत्रण से बाहर हो चुकी है। कई छात्र संगठनों और मजदूर यूनियनों द्वारा सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद करने से इस वक्त कम से कम पांच लाख लोग सड़कों पर उतर आए हैं। शिक्षा व्यवस्था में भ्रष्टाचार, स्कूलों की बदहाली जैसे मुद्दों पर प्रâांस में हजारों छात्र पहले से ही सड़कों पर उतरकर उग्र प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने सरकारी संपत्ति में आग लगा दी है। ट्रेनें रोक दी गई हैं। खाद्यान्न की आपूर्ति भी ठप हो गई है। पिछले तीन-चार दिनों से पेरिस जैसे शहरों से धुएं के गुबार उठते दिख रहे हैं, लेकिन यह आंदोलन १७० से भी ज्यादा शहरों में पैâल चुका है। शिक्षक, दमकलकर्मी और स्वास्थ्यकर्मी भी सरकार विरोधी प्रदर्शनों में शामिल हो गए हैं, जिससे देश पूरी तरह लाचार और अपाहिज हो गया है। यह तस्वीर भले ही आज फ्रांस की हो, लेकिन भारत की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि वहां लोगों ने आगजनी कर अपने गुस्से का विस्फोट किया है, जबकि भारत के आंदोलनों में गुस्सा तो दिख रहा है, पर संयम कायम है। भारत की ही तरह फ्रांस की अर्थव्यवस्था भी कंगाली के कगार पर आ खड़ी हुई है। सेबस्टियन लेकोर्नू सरकार २०२७ के बजट में करीब ५४ अरब यूरो की कटौती की तैयारी कर रही है। इसमें
सरकारी कर्मचारियों के
मूल वेतन पर रोक लगाने का प्रस्ताव है, जिससे उनकी क्रय शक्ति घटेगी। पिछले आठ सालों से फ्रांस में कर्मचारियों के वेतन में एक यूरो की भी बढ़ोतरी नहीं हुई है। फ्रांस का सार्वजनिक कर्ज उसकी जीडीपी के ११९ फीसदी तक पहुंच चुका है और यह कर्ज लगातार बढ़ता ही जाएगा। २०२७ में तो केवल कर्ज का ब्याज ही शिक्षा और रक्षा के बजटीय आवंटन से ज्यादा हो जाएगा। भारत में स्थिति इससे भी ज्यादा चिंताजनक है। लोगों को डर लग रहा है कि सरकार आर्थिक तंगी में होने के कारण बैंकों में जमा उनकी पूंजी और बचत पर डाका डालेगी और राष्ट्रहित के नाम पर मध्यमवर्ग के बैंक बैलेंस व पेंशन पर हाथ साफ कर देगी। महाराष्ट्र जैसे राज्य में सूखा भीषण है और सूखे से निपटने के लिए ही फडणवीस सरकार को ४० हजार करोड़ रुपए का कर्ज लेना पड़ रहा है। आर्थिक बदहाली के इस दौर में भी मोदी और उनके लोगों की फिजूलखर्ची बदस्तूर जारी है। भारत का मजदूर वर्ग भी वजूद की लड़ाई लड़ रहा है। २०२६ में नोएडा, ग्रेटर नोएडा और मानेसर में मजदूरों का आंदोलन भड़क उठा। वहां कई मजदूर बमुश्किल दस हजार रुपए के वेतन में गुजारा कर रहे थे; आखिरकार उनके सब्र का बांध टूट गया। सरकार ने उन पर गोलियां चलवाईं। देश के बाकी हिस्सों में भी यही आलम है। पूरे देश में ३१ हजार ४३४ जगहों पर आंदोलन चल रहे हैं। राहुल गांधी ने दो दिन पहले अपील की थी कि जहां भी आंदोलन चल रहे हैं, आंदोलनकारी उसकी जानकारी `सत्याग्रह’ वेबसाइट पर दर्ज कराएं; उन्हीं दर्ज आंकड़ों के आधार पर यह संख्या सामने आई है। भाजपा के लचर और निकम्मे शासन के कारण हमारा भारत आंदोलनों का देश बन गया है। हमारे देश में विधायकों-सांसदों को खरीदने के लिए ५०-७५ करोड़ रुपए निकल आते हैं, लेकिन १२ घंटे पसीना बहाने वालों को महीने के
दस-बारह हजार रुपए
मिलना भी दुश्वार हो गया है। क्या इसे देश की `जीडीपी’ वृद्धि की रफ्तार माना जाए? ऊपर से इन मजदूरों को हफ्ते की छुट्टी तक नसीब नहीं है। मजदूर वर्ग के पास कोई सुरक्षा नहीं है; उनका पूरी तरह से ठेकेदारीकरण कर दिया गया है। मजदूरों को न प्रोविडेंट फंड मिलता है, न स्वास्थ्य सेवाएं और न ही उनके बच्चों की शिक्षा का कोई इंतजाम है और दावा यह कि भारत प्रगति के पथ पर अग्रसर है! मोदी रशिया-यूक्रेन युद्ध का समाधान बताते फिरते हैं, लेकिन भारत की जनता की गरीबी, महंगाई और भ्रष्टाचार का कोई समाधान उनके पास नहीं है। मजदूर यूनियनों से हड़ताल करने का हक मोदी सरकार ने छीन लिया है। हड़ताली मजदूरों को `मेस्मा’ जैसे सख्त कानूनों के तहत जेल में ठूंसा जा रहा है। देश की महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। किसान खुदकुशी कर रहा है। नीट और लोक सेवा आयोग की प्रतियोगी परीक्षाएं महज चोरबाजारी का जरिया बनकर रह गई हैं। भारत और फ्रांस के हालात एकदम `सेम टू सेम’ हैं। फ्रांस में डीजल और बिजली-ऊर्जा महंगी होने से जनाक्रोश बढ़ा, तो भारत में दालें, सब्जियां और दवाइयां महंगी हो गई हैं। प्रâांस में मजबूत मजदूर संगठन हैं और वहां हड़ताल को कानूनी मान्यता प्राप्त है, इसीलिए वहां अगर दस-बारह फीसदी कर्मचारी भी हड़ताल पर चले जाएं तो वह राष्ट्रीय मुद्दा बन जाता है। भारत में तो मजदूर संगठनों को सरकार और देश का दुश्मन घोषित कर दिया गया है। सरकार की इस तानाशाही और दमनकारी नीति को दरकिनार कर मेहनतकश अपने हक के लिए, किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए, छात्र पर्चा लीक होने के खिलाफ और आम नागरिक वोटों की चोरी रोककर लोकतंत्र की रक्षा के लिए आंदोलन कर रहे हैं। प्रâांस इन्हीं मुद्दों की आग में सुलग रहा है, जल रहा है; और भारत में फिलहाल अंदर ही अंदर घुटता हुआ उबाल जारी है, धमाका कभी भी हो सकता है!

अन्य समाचार