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संवैधानिक पाप करने वाले गुट को क्या पार्टी चिह्न देना चाहिए?.. सर्वोच्च न्यायालय ने शिंदे गुट पर की सवालों की बौछार

सामना संवाददाता / नई दिल्ली

शिवसेना पक्ष और धनुष-बाण चिह्न से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान मंगलवार को सर्वोच्च न्यायालय ने शिंदे गुट पर सवालों की बौछार कर दी। न्यायालय ने तीखा सवाल उठाते हुए पूछा कि चुनाव चिह्न उस गुट को दिया जाना चाहिए, जिसने संवैधानिक पाप किया है या उस गुट को, जिसने संवैधानिक पाप के खिलाफ शिकायत की है? न्यायालय ने शिंदे गुट से कहा कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत राजनीतिक दल को दल-बदल की स्थिति को रोकने का अधिकार हमेशा प्राप्त है। यदि अयोग्य ठहराए गए सदस्य अलग हो जाते हैं, तो बचे हुए सदस्यों को अलग चिह्न मिलता है।
मूल शिवसेना से गद्दारी करने वाले शिंदे गुट को पार्टी का नाम और धनुष-बाण चिह्न देने के केंद्रीय चुनाव आयोग के पैâसले के खिलाफ शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की है। वहीं, गद्दार विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग को लेकर विधान मंडल में शिवसेना के मुख्य सचेतक सुनील प्रभु ने भी अलग याचिका दायर की है।
इन दोनों याचिकाओं पर प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष अंतिम सुनवाई चल रही है। मंगलवार की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल शिंदे गुट की ओर से पक्ष रख रहे थे। इसी दौरान न्यायमूर्ति बागची ने सुभाष देसाई मामले और सादिक अली मामले सहित पुराने मामलों के पैâसलों का हवाला देते हुए शिंदे गुट से लगातार सवाल किए।
इसी क्रम में मूल राजनीतिक दल से बगावत करने की शिंदे गुट की कार्रवाई पर न्यायालय ने ‘संवैधानिक पाप’ जैसी टिप्पणी की। न्यायमूर्ति बागची ने सीधा सवाल किया कि इस मामले में पार्टी के चिह्न का लाभ संवैधानिक पाप करने वाले गुट को मिलेगा या संवैधानिक पाप के खिलाफ शिकायत करने वाले पक्ष को? न्यायालय के इस तीखे और मार्मिक सवाल पर शिंदे गुट के अधिवक्ता स्पष्ट जवाब नहीं दे सके। उन्होंने केवल औपचारिक जवाब देकर मामले को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। अंतिम चरण में पहुंच चुके शिवसेना पार्टी और धनुष-बाण चिह्न के इस मामले की सुनवाई बुधवार को लगातार दूसरे दिन भी होगी।
न्यायालय का नजरिया
देश में राजनीति की जटिल परिस्थितियों में केवल संगठनात्मक सदस्यों की संख्या के आधार पर जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के वास्तविक समर्थन का आकलन करना कठिन हो सकता है। जब हम अलग हुए विधायकों की अयोग्यता पर विचार करते हैं, तो केवल यह तथ्य कि राजनीतिक दल ने किसी विशेष व्यक्ति को ‘व्हिप’ के रूप में प्रस्तावित किया था और दो-तीन अन्य लोगों ने किसी दूसरे व्यक्ति को ‘व्हिप’ के रूप में प्रस्तावित किया, अपने आप में ही उन्हें संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुच्छेद २(१)(ब) के तहत अयोग्य ठहराने के लिए पर्याप्त है।

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