महाराष्ट्र के प्रगतिपथ पर अग्रसर होने का ढोल रोज पीटा जा रहा है। लेकिन महाराष्ट्र के मौजूदा मुख्यमंत्री फडणवीस देश के सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्रियों की सूची में शीर्ष पांच में भी नहीं हैं। प्रगतिपथ पर अग्रसर महाराष्ट्र की यही सच्ची तस्वीर है। इस प्रगतिपथ पर अग्रसर राज्य में कल तक संपन्न और आर्थिक रूप से सुरक्षित लोग भी अब आत्महत्या करने लगे हैं। नागपुर के एक बड़े सरकारी ठेकेदार पी.वी. वर्मा द्वारा भी आत्महत्या कर लेना चौंकानेवाली घटना है, वजह क्योंकि सरकार करोड़ों रुपए बकाया नहीं चुका रही थी। इसने एक बार फिर प्रगतिपथ पर अग्रसर महाराष्ट्र की तस्वीर को दाग लगा दिया है। मुख्यमंत्री फडणवीस ने दो दिन पहले ही यह दावा किया था कि महाराष्ट्र में ३४-३५ हजार करोड़ रुपए का निवेश हो रहा है। लेकिन मुख्यमंत्री द्वारा पेश की गई तस्वीर के उलट महाराष्ट्र के हालात हैं और इसे साबित करने वाली घटनाएं रोज हो रही हैं। महाराष्ट्र पहले ही किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं के लिए बदनाम हो चुका है। अब यह सरकार सरकारी ठेकेदारों पर भी यह नौबत ले आई है कि उन्हें भी आत्महत्या करना पड़ रहा है। ४० करोड़ रुपए का सरकारी बिल बकाया होने से निराश ठेकेदार पी.वी.वर्मा ने सोमवार को अपने आवास पर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। यह घटना मुख्यमंत्री के अपने इलाके नागपुर में हुई। जुलाई में सांगली जिले के एक युवा ठेकेदार हर्षल पाटील ने भी
सरकार के पास बकाया
१.४ करोड़ रुपए न मिलने पर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी, वे बार-बार मांग कर हताश और निराश हो चुके थे। अब नागपुर में भी ऐसा ही हुआ है। सांगली के हर्षल पाटील सरकार की बहुप्रचारित योजना ‘जल जीवन मिशन’ के ठेकेदार थे, जबकि वर्मा लोक निर्माण के ठेकेदार थे। नागपुर, गोंदिया और विदर्भ के अलग-अलग इलाकों में उनका सरकारी काम चल रहा था। लेकिन ४० करोड़ रुपए का बकाया मिलने की सरकार और प्रशासन से कोई उम्मीद न दिखने पर उन्हें यह खौफनाक अंतिम कदम उठाना पड़ा। राज्य में जो बुरे हालात कर्ज में डूबे किसानों के हैं सरकार ने उसी तरह के हालात कर्ज में डूबे सरकारी ठेकेदारों के कर दिए हैं। राज्य के कई छोटे-बड़े सरकारी ठेकेदार बकाया पैसों और उसके लिए होने वाली परेशानियों से हताश हैं और इतना कुछ करने के बावजूद उन्हें बदले में कुछ नहीं मिल रहा है। इन सभी का सरकार पर बकाया कोई छोटा-मोटा नहीं, बल्कि ८९,००० करोड़ रुपए का है। हुक्मरान बातें तो बड़ी-बड़ी कर रहे हैं; लेकिन सरकारी खजाना तो ठन-ठन गोपाल है इसलिए सारी बातें खोखली साबित हो रही हैं। इस बीच कर्ज में डूबे किसान और ठेकेदार ‘मर’ रहे हैं। सत्ताधारियों ने चुनाव जीतने के लिए सरकारी
खजाने की बेजा लूट
की है। इसीलिए आज सरकारी खजाना बेहाल है और हुक्मरान समय बर्बाद कर रहे हैं। जो शासक कहते रहे हैं कि वे किसानों और ठेकेदारों का पूरा-पूरा ख्याल रखेंगे वे दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे हैं। दो महीने पहले, जलगांव में एक ठेकेदार ने निराशा के कारण मुख्यमंत्री के काफिले के सामने आत्मदाह करने की कोशिश की थी। जब उप मुख्यमंत्री अजीत पवार वर्धा में दौरे पर थे, तब एक ठेकेदार ने वहां भी आत्महत्या का प्रयास किया था। उस समय उप मुख्यमंत्री ने शेखी बघारते हुए कहा था, ‘मैं ठेकेदारों को आत्महत्या नहीं करने दूंगा।’ लेकिन पहले उनके पश्चिम महाराष्ट्र में और अब मुख्यमंत्री के नागपुर में ठेकेदारों पर अपना जीवन समाप्त करने की नौबत आ गई है। राज्य के हुक्मरानों ने हजारों कर्जदार किसानों और सरकारी ठेकेदारों को आत्महत्या के कगार पर ला खड़ा किया है। यह सरकार न तो किसानों का कर्ज माफ कर रही है और न ही ठेकेदारों को उनके हक का बकाया चुका रही है। एक तरफ कर्ज चुकाने का दबाव और दूसरी तरफ लेनदारों के दबाव ने राज्य के किसानों और सरकारी ठेकेदारों को जानलेवा दुविधा में डाल दिया है। इस असहनीय दुविधा में फंसे हर्षल पाटील और पी.वी. वर्मा जैसे ठेकेदार इससे छुटकारा पाने के लिए मौत को गले लगा रहे हैं। क्या यही प्रगतिपथ पर अग्रसर महाराष्ट्र है?
