भारतीय जनता पार्टी की नींद उड़ा देनेवाली भारी भीड़ रामलीला मैदान में उमड़ पड़ी, इसे ‘इंडिया गठबंधन’ की सफलता मानना ही होगा। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के भ्रष्ट आचरण के विरोध में राहुल गांधी द्वारा दिए गए ‘चलो दिल्ली’ के नारे पर १ नवंबर को देशभर से लाखों लोग दिल्ली पहुंच गए। भाजपा नेताओं को यह भीड़ दिखाई नहीं दी। वे कहते हैं कि पांच-छह हजार लोग जुटे थे। यह उनका डर बोल रहा है। मोदी-शाह ने राहुल गांधी को ‘पप्पू’ साबित करने की पूरी कोशिश की, लेकिन अब राहुल गांधी ने उन्हीं मोदी-शाह को बेचैन कर दिया है। रविवार को दिल्ली के ज्यादातर रास्ते भीड़ से ‘जाम’ हो गए थे और ‘रैली’ में बाधा डालने के लिए जगह-जगह भारी दल-बल और बैरिकेड्स खड़े किए गए थे। फिर भी रामलीला मैदान और दिल्ली की सड़कें भीड़ से छलक रही थीं। इसका मतलब यह है कि मोदी-शाह-ज्ञानेश कुमार के ‘वोट चोरी’ प्रोजेक्ट के खिलाफ जनता उबल पड़ी है। गोदी मीडिया ने इसे चाहे जितना छिपाने की कोशिश की, लेकिन सच सामने आ ही गया। लोगों में भारी उत्साह था और पिछले पचास वर्षों में दिल्ली में इतनी भारी राजनीतिक भीड़ कभी नहीं जुटी थी। यह गलतफहमी कि भारतीय जनता अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार नहीं है और वह मोदी-भक्ति में अंधी हो चुकी है, रविवार की भव्य ‘रैली’ ने खारिज कर दी। १ नवंबर का ‘दिल्ली चलो’ नारा मोदी-शाह के अहंकार को चुनौती देनेवाला था। तानाशाह से जनता की चुनौती झेली नहीं जाती और वह बौखला जाता है। अमित शाह ने कहा कि ‘दिल्ली चलो’ का नारा अराजकता को निमंत्रण है, जबकि प्रधानमंत्री मोदी ने यह ढिंढोरा पीटा कि विपक्षी दल देश का विभाजन करना चाहते हैं। यह उनके मन का डर है। अरुणाचल प्रदेश में चीन की घुसपैठ, मणिपुर में हिंसा, प. बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में बिगड़ती कानून-व्यवस्था की स्थिति देश को अस्थिरता की ओर ले जा रही है, यह हमारे प्रधानमंत्री को नहीं लगता, लेकिन विपक्ष का चुनाव आयुक्त के खिलाफ मैदान में उतरना अराजकता लगता है! रामलीला मैदान पर उमड़ी यह भीड़ ‘इंडिया गठबंधन’ की सफलता है, इसे मानना ही होगा।
भ्रष्ट कामकाज के खिलाफ
शुरू किया गया अभियान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए आरंभ किया गया आंदोलन अराजकता प्रतीत होता है, यह मोदी-शाह के पाखंड का लक्षण है। रामलीला मैदान की ‘रैली’ लोकतंत्र की रक्षा के लिए लगाई गई हुंकार है। २५ जून १९७५ के बाद दिल्ली में ऐसी हुंकार कभी नहीं गूंजी थी। २५ जून १९७५ को जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में लोकतंत्र की रक्षा के लिए भारी जनसमूह सड़कों पर उतरा था। रामलीला मैदान में भी भारी भीड़ जुटी थी। रविवार, १ नवंबर को रामलीला मैदान में हुई ‘चलो दिल्ली’ रैली उसी ‘जेपी’ आंदोलन की याद दिलाती है। लोगों का वही उत्साह, वही गुस्सा और ‘रेजीम चेंज’ (सत्ता परिवर्तन) करने की वही जिद दिखाई दे रही थी। राहुल गांधी ने दिल्ली पर अपनी पकड़ बना ली है और वे रविवार को देश की एक विशाल भीड़ का नेतृत्व करते हुए नजर आए। रामलीला मैदान की ओर बढ़ रही भीड़ और उस भीड़ में तमाम विपक्षी दलों सहित राहुल गांधी की अग्रणी भूमिका ने भाजपा की स्थिति दयनीय कर दी है। खुली बस में राहुल गांधी का ड्राइवर के पास बैठना और पीछे तमाम विपक्षी दलों का उनके साथ होना, यह दृश्य मोदी-शाह की नींद उड़ाने वाला है। राहुल गांधी ने कहा कि, ‘वर्ष २०२४ में मोदी-शाह की हार हो चुकी है। ज्ञानेश कुमार की मदद के कारण ही ये दोनों तानाशाह दोबारा सत्ता में आए हैं। इसलिए मोदी, शाह और ज्ञानेश कुमार को जाना ही होगा।’’ इस पर मोदी ने अपना पुराना राग अलापा कि ‘‘मोदी कहीं नहीं जाएगा।’’ इस पर गांधी ने चुनौती दी, ‘हां, मोदी कहीं नहीं जाएंगे। हम उन्हें छोड़ेंगे नहीं। कहीं भागने नहीं देंगे। उनके पापों का हिसाब किया जाएगा और मोदी, शाह तथा ज्ञानेश कुमार पर कानूनी कार्रवाई ही की जाएगी।’ इसका मतलब यह है कि मोदी आदि लोग कहीं नहीं जाएंगे, बल्कि वे सीधे दिल्ली की जेल में जाएंगे। वोट चोरी अब एक राष्ट्रीय नारा बन गया है। यह
जनता की आवाज
बन गया है। मतदाता सूची में घोटाले, करोड़ों की संख्या में मतदाताओं के नाम गायब करना, एसआईआर के नाम पर मोदी-शाह की मदद करनेवाला काम करना, इस सबके खिलाफ जनमत का यह उद्रेक अराजकता नहीं है, बल्कि मोदी, शाह और ज्ञानेश कुमार द्वारा पैदा की गई इस भयानक स्थिति के खिलाफ जनता का यह विद्रोह है। शाह कहते हैं, ‘‘इंडिया गठबंधन मतदाता सूची में शामिल बांग्लादेशी घुसपैठियों का समर्थन कर रहा है।’’ शाह का यह बयान बेवकूफों जैसा है। जिन साढ़े तेरह करोड़ नामों को मतदाता सूची से हटाया गया, क्या वे सब बांग्लादेशी हैं? बांग्लादेश की आबादी १५ करोड़ है, लेकिन यदि शाह का यह कहना है कि भारत में साढ़े तेरह करोड़ बांग्लादेशी मतदाता सूची में हैं, तो गृह मंत्री के रूप में यह उनकी असफलता है। पिछले बारह वर्षों में क्या आप अपने ही सिर के बचे-खुचे बाल नोच रहे थे? गृह मंत्री अमित शाह साढ़े तेरह करोड़ बांग्लादेशियों को पाल रहे हैं और इस बात के लिए प्रधानमंत्री मोदी को शाह को बर्खास्त कर देना चाहिए। चुनाव सूची में घोटाले हैं, यह केवल विपक्ष का आरोप नहीं है, बल्कि दो चुनाव आयुक्तों ने इसे खुले तौर पर उजागर किया है। फिर भी ज्ञानेश कुमार निर्लज्जता से अपनी कुर्सी से चिपके हुए हैं और शाह-मोदी जैसे भ्रष्ट लोगों को संरक्षण दे रहे हैं। संरक्षण की ये दीवारें रविवार की ‘रैली’ से ढह गई हैं। रैली को रोकने के सरकार के सभी प्रयास विफल हो गए। १९७५ में सत्ता परिवर्तन की जो हुंकार रामलीला मैदान से भरी गई थी, उससे भी अधिक बुलंद हुंकार रविवार को उसी मैदान से गूंजी। मोदी, शाह और ज्ञानेश कुमार को जाना ही होगा, रामलीला मैदान की रैली का यही संदेश है। कुल मिलाकर, मोदी-शाह आदि मंडली की ‘लवणेन भोज्यम’ करनेवाली यह रैली देश में क्रांति ला देगी।
