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१३ करोड़ से अधिक नाम हटाने पर राष्ट्रीय विवाद…चुनाव आयोग के सामने चुनौती!

एसआईआर में हटाए गए मतदाताओं की पात्रता और अपील प्रक्रिया पर सवाल
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
देशभर में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान १३ करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने का मामला राष्ट्रीय राजनीतिक विवाद बन गया है। दिल्ली के रामलीला मैदान में रविवार को इंडिया गठबंधन की महारैली के बाद चुनाव आयोग की जवाबदेही, हटाए गए मतदाताओं की वास्तविक स्थिति और अपील प्रक्रिया को लेकर सवाल तेज हो गए हैं। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूचियों की शुद्धता के नाम पर बड़ी संख्या में पात्र नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित किया गया है।
एसआईआर के दौरान करीब १३ करोड़ नाम मतदाता सूचियों से हटाए गए। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, १३.३९ करोड़ मतदाताओं को अनुपस्थित, स्थायी रूप से स्थानांतरित, मृत, दोहरे पंजीकरण अथवा अन्य श्रेणियों में चिह्नित किया गया।
६.३० करोड़ स्थानांतरित, ३.०१ करोड़ लापता!
आयोग के श्रेणीवार आंकड़ों के अनुसार, ६.३० करोड़ मतदाता स्थायी रूप से स्थानांतरित, ३.०१ करोड़ अनुपस्थित अथवा पता नहीं चलने वाले, २.८० करोड़ मृत और १.०२ करोड़ दोहरे पंजीकरण वाले बताए गए। शेष २६ लाख अन्य श्रेणियों में रखे गए। इन आंकड़ों ने सबसे बड़ा सवाल खड़ा किया है कि जिन नागरिकों को अनुपस्थित या स्थानांतरित बताया गया, उनमें वास्तव में कितने पात्र मतदाता हैं और कितनों को दोबारा सूची में शामिल किया गया?
लंबित अपीलों का हिसाब सार्वजनिक करे आयोग
अब चुनाव आयोग के सामने चुनौती है कि वह राज्यवार और बूथवार हटाए गए नामों, आपत्तियों, बहाल किए गए मतदाताओं तथा लंबित अपीलों का पूरा हिसाब सार्वजनिक करे। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि मतदाता सूची की शुद्धता के अभियान में कितने पात्र नागरिक प्रभावित हुए। १३.३९ करोड़ का आंकड़ा प्रारूप सूचियों और पुनरीक्षण श्रेणियों से संबंधित है। इसे इतने ही पात्र मतदाताओं के स्थायी रूप से मताधिकार खो देने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
जिंदा मतदाता को बताया मृत! विपक्ष ने उठाए सवाल
दिल्ली के ५३ वर्षीय दर्जी कामता प्रसाद का मामला उजागर किया, जिन्हें मतदाता सूची में मृत दर्ज कर दिया गया। प्रसाद को खुद को जीवित साबित करने के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़े। चुनाव आयोग का कहना है कि गलत तरीके से नाम हटाए जाने पर संबंधित नागरिक दावा, आपत्ति और अपील कर सकते हैं। आयोग राजनीतिक पक्षपात के आरोपों से इनकार करता है, लेकिन विपक्ष सवाल उठा रहा है कि गलती प्रशासन की हो तो उसे सुधारने का बोझ नागरिक पर क्यों डाला जाए?

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