मुख्यपृष्ठनए समाचारसंपादकीय : बढ़ते कर्ज का फंदा!

संपादकीय : बढ़ते कर्ज का फंदा!

`उधार लेकर त्योहार मनाना,’ ऐसी एक कहावत है। देश की सभी राज्य सरकारें और केंद्र सरकार भी पिछले कुछ सालों से इसी ढर्रे पर चल रही हैं, यानी अंधाधुंध कर्ज लेकर अपनी हुकूमतों के जश्न मना रही हैं। `वैâग’ जैसी जिम्मेदार संस्था ने देश के सभी राज्यों पर चढ़े कर्ज के बोझ के जो आंकड़े जारी किए हैं, वे चौंकाने वाले हैं। पिछले दस सालों में देश के सभी २८ राज्यों पर कर्ज का बोझ तकरीबन १९० फीसदी बढ़ गया। साल २०१५-१६ में राज्यों पर ३१.२० लाख करोड़ रुपए का कर्ज था, जो अब बढ़कर ९०.५१ लाख करोड़ रुपए हो चुका है। अर्थशास्त्र की ककहरा जानने वाले किसी भी शख्स की आंखें फटी की फटी रह जाएं, ये ऐसे आंकड़े हैं। वित्तीय अनुशासनहीनता और चुनाव जीतने के लिए लोक-लुभावन घोषणाओं पर सरकारी खजाना लुटाने की सनक के चलते राज्य सरकारें दिन-ब-दिन कर्ज के दलदल में धंसती जा रही हैं, यह कड़वा सच सीधे तौर पर उजागर करने से भले ही `वैâग’ कतराई हो, लेकिन इस रिपोर्ट के जरिए राज्यों की बदहाल माली हालत और कर्ज के पहाड़ की जो हकीकत देश के सामने आई है, वह भी कम नहीं है। नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की `वित्त- २०२४-२५’ की रिपोर्ट के मुताबिक, देश के सभी राज्यों का कुल बजट खर्च ५१.२० लाख करोड़ रुपऐ है और कर्ज का आंकड़ा १०० लाख करोड़ तक पहुंच रहा है! आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपइया, मुफ्त की योजनाओं के लिए भारी-भरकम फंड की जरूरत, आर्थिक विकास का गिरता ग्राफ और पुराना ब्याज चुकाने के लिए भी लेना पड़ रहा है
नया कर्ज
इसी वजह से महाराष्ट्र समेत तमाम राज्यों का आर्थिक पहिया पूरी तरह पटरी से उतर गया है। देश के लगभग सभी राज्य वित्तीय घाटे से जूझ रहे हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक, बिहार, असम, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ समेत १५ राज्यों का राजस्व घाटा ३.४६ लाख करोड़ रुपए तक जा पहुंचा है। ये आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि कर्ज के इस जाल के कारण ही पिछले दस वर्षों में राज्यों की आर्थिक स्थिति तेजी से चरमराई है। मौजूदा दौर में जब देश की कोई भी केंद्रीय संस्था स्वायत्त (इंडिपेंडेंट) होकर काम करती नहीं दिख रही, ऐसे में कैग जैसी संस्था ने राज्यों की बदहाली का जो आईना दिखाया है, उसके लिए उसकी तारीफ करनी ही होगी। राज्यों की कमाई का एक बड़ा हिस्सा कर्मचारियों की सैलरी, पेंशन और कर्ज के ब्याज व किश्तें चुकाने में ही स्वाहा हो रहा है। अकेले साल २०२४-२५ में राज्यों की तिजोरी का ४३ फीसदी से ज्यादा खर्च इन्हीं तीन मदों पर हुआ। कर्ज के इस फंदे और उसकी भारी-भरकम किश्तों के चलते विकास कार्यों के लिए राज्यों के पास धेला भी नहीं बच रहा है। अगर सिर्फ महाराष्ट्र की बात करें, तो आने वाले वित्तीय वर्ष तक महाराष्ट्र के सिर पर कर्ज का बोझ ११ लाख करोड़ रुपए से ज्यादा हो जाएगा। पिछले एक साल के भीतर ही महाराष्ट्र के कर्ज में पौने दो लाख करोड़ रुपए का भारी इजाफा हुआ है। हालांकि, महाराष्ट्र की सकल घरेलू उत्पाद ५१ लाख करोड़ के आस-पास है, लेकिन प्रति व्यक्ति आय के मामले में
महाराष्ट्र पिछड़
गया है। प्रति व्यक्ति आय के मामले में तेलंगाना पहले नंबर पर है। उसके बाद क्रमश: कर्नाटक, तमिलनाडु और गुजरात का नंबर आता है, जबकि महाराष्ट्र खिसककर पांचवें स्थान पर पहुंच गया है। कर्मचारियों के वेतन और पेंशन पर ही महाराष्ट्र सरकार के करीब ढाई लाख करोड़ रुपए खर्च हो जाते हैं और कर्ज के सिर्फ ब्याज के तौर पर सरकार को ६५ हजार करोड़ रुपए चुकाने पड़ते हैं। इस ब्याज के चलते महाराष्ट्र के राजस्व खर्च पर भारी दबाव है। इसके बावजूद, खोखली हनक दिखाने के लिए लाखों करोड़ की नई योजनाओं और प्रोजेक्ट्स की घोषणाओं की बौछार थमने का नाम नहीं ले रही। साफ है कि इन तमाम कामों या योजनाओं को पूरा करने के लिए फिर से नया कर्ज उठाना पड़ेगा, और उसका ब्याज चुकाने का नया बोझ आखिरकार महाराष्ट्र की जनता की पीठ पर ही लादा जाएगा। कर्ज में हुई इस तिगुनी बढ़ोतरी और उसके ब्याज के तौर पर चुकाए जाने वाले लाखों करोड़ रुपयों ने राज्यों की आर्थिक कमर तोड़ कर रख दी है। खुद केंद्र सरकार पर भी करीब दो सौ लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। साल २०१४ में जो केंद्रीय कर्ज ५५ लाख करोड़ के आसपास था, वह भी अब तकरीबन चार गुना बढ़ चुका है। राज्यों को वित्तीय अनुशासन का पाठ पढ़ाने के बजाय, ऐसा लग रहा है कि केंद्र और राज्यों के बीच ज्यादा से ज्यादा कर्जदार बनने की कोई होड़ मची है। अगर टैक्सपेयर्स का खून-पसीने का पैसा सिर्फ ब्याज चुकाने में ही उड़ेगा, तो देश वैâसे चलेगा? यह बढ़ता कर्ज देश की अर्थव्यवस्था को किस खाई में धकेलने वाला है? कर्ज का यह फंदा देश की गर्दन पूरी तरह दबोच ले, इससे पहले हम होश में आएंगे या नहीं?

अन्य समाचार