केंद्र और राज्य के सत्ताधारी आदिवासियों के विकास के दावे हमेशा करते रहते हैं। वास्तव में वे कितने झूठे हैं, यह दो दिन पहले नासिक में उमड़े हजारों आदिवासी भाइयों-बहनों के जनाक्रोश ने फिर दिखा दिया। राज्यभर के आठ से दस हजार आदिवासी भाई-बहन मंगलवार को नासिक के आदिवासी आयुक्तालय पर पहुंचे। आदिवासी छात्रों की कई लंबित मांगों को लेकर कुंभकर्णी नींद में सोई सरकार को जगाने के लिए उन्हें यह ‘उलगुलान’ करना पड़ा। राज्य के विभिन्न शहरों में पहले अनशन और मंगलवार को ‘उलगुलान मोर्चा’ जैसा झटका देने के बाद मुख्यमंत्री फडणवीस की नींद खुली। उन्होंने आंदोलनकारी छात्रों के साथ चर्चा की और उनकी सभी मांगें मान लीं। इन पैâसलों के क्रियान्वयन के संदर्भ में तीन महीने बाद समीक्षा करने का आश्वासन दिया। सवाल सिर्फ इतना है कि सरकार को यह सब स्वीकार ही करना था तो आदिवासी छात्रों को १७ दिनों तक अनशन करने पर मजबूर क्यों किया? हजारों आदिवासियों पर नासिक के आदिवासी
आयुक्तालय पर धावा
बोलने की नौबत क्यों आने दी? जब उन्होंने अनशन शुरू किया था, उसी समय उनसे खुद संवाद साधा होता, उनसे चर्चा की होती तो सरकार के आदिवासी कल्याण के दावों को बल मिलता; परंतु सत्ताधारियों ने ऐसा कुछ नहीं किया। जिस आदिवासी विकास मंत्री के कामकाज पर ही आदिवासी छात्रों को मुख्य आपत्ति है, उन्हीं से उन्हें चर्चा करने पर मजबूर किया। राज्य के आदिवासी समाज और आदिवासी संस्कृति को लेकर मौजूदा सरकार की नीयत शुरू से ही साफ नहीं है। आदिवासियों के प्रति उनके मन में द्वेष है। एक तरफ यह सरकार आदिवासी दिवस के समारोह मनाती है और दूसरी तरफ आदिवासियों के जंगल, जमीन अपने चहेते उद्योगपतियों के हवाले करती है। आदिवासियों का विरोध कुचलती है। उन्हें वहां से विस्थापित करती है। जल, जंगल और जमीन पर उनका स्वामित्व, उनका पारंपरिक अधिकार छीनती है। मुख्यमंत्री फडणवीस ही गढ़चिरौली जिले के पालक मंत्री हैं और इस जिले को देश का ‘स्टील हब’ बनाने का सपना वे देख रहे हैं। उनका सपना बुरा नहीं है, परंतु इसके लिए वे स्थानीय
आदिवासियों की बलि
दे रहे हैं, उसका क्या? आदिवासी आश्रमशालाएं और वहां पढ़कर बड़े होने का सपना देखनेवाले आदिवासी लड़के-लड़कियों को सरकार या तो सांप के काटने से मरने पर मजबूर कर रही है या फिर कठोर शर्तें और नियम थोपकर उनके उच्च शिक्षा के दरवाजे बंद कर रही है। आश्रमशालाओं में मौतों को रोकने के लिए उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए आदेशों और करीब दस साल पहले डॉ. सुभाष सालुंखे समिति की सिफारिशों को इस सरकार ने कचरे के डिब्बे में फेंक दिया है। करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद आश्रमशालाओं के आदिवासी बच्चे न सुरक्षित हैं, न ही शिक्षा प्राप्त कर पा रहे हैं। इसके खिलाफ जब उन्होंने ‘उलगुलान’ किया तो फडणवीस सरकार के एक मंत्री उन्हें ‘खा-पीकर लड़ो’ जैसी सलाह देकर उनके आंदोलन का मजाक उड़ा रहे हैं। मुख्यमंत्री फडणवीस ने अब आदिवासी छात्रों की मांगें मान ली हैं। हालांकि, यह आश्वासन हवा के बुलबुले साबित न हों। अपने न्यायपूर्ण अधिकारों के लिए शुरू हुआ आदिवासियों का ‘उलगुलान’ अब रुकेगा नहीं, यह वे पक्के तौर पर ध्यान रखें।
