सामना संवाददाता / मुंबई
मुंबई की जीवनरेखा कही जाने वाली बेस्ट परिवहन सेवा एक अजीबोगरीब कारण से चर्चा में है। यहां कर्मचारियों को हर महीने वेतन के नाम पर नोटों की गड्डियां नहीं, बल्कि थैले भर-भरकर सिक्के मिल रहे हैं। जून महीने में तो कई कर्मचारियों को २०,००० रुपए तक की राशि नकद में थमा दी गई, जिसमें से १,००० रुपए सिर्फ सिक्कों के रूप में दिए गए।
रिपोर्ट के अनुसार, बेस्ट प्रशासन का तर्क है कि टिकट बिक्री और बिजली बिलों से भारी मात्रा में छोटे नोट और सिक्के जमा हो जाते हैं। बैंक इन्हें लेने से कतराते हैं और खुले बाजार में इन्हें चलाना मुश्किल होता है। ऐसे में बेस्ट ने ‘समस्या’ को ‘सिस्टम’ बना दिया, कर्मचारियों को वेतन का बड़ा हिस्सा इन्हीं सिक्कों से दिया जाने लगा। हालांकि, यह व्यवस्था अब कर्मचारियों के लिए सिरदर्द बन गई है। रोजमर्रा की खरीदारी, यात्रा और बैंकिंग जैसी बुनियादी जरूरतों में इन सिक्कों को संभालना और इस्तेमाल करना भारी पड़ रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि हर महीने वेतन नहीं, जैसे लोहे की गठरी दी जा रही है।
जून में जारी हुआ था परिपत्र
सूत्रों के अनुसार, यह प्रथा पिछले ५-६ वर्षों से जारी है, लेकिन हालिया महीनों में इसमें बढ़ोतरी देखी गई है। जून में कर्मचारियों को वेतन से पहले जारी परिपत्र में सूचित किया गया कि १९,००० रुपए नोटों में और १,००० रुपए सिक्कों में दिए जाएंगे, जबकि बाकी राशि बैंक खातों में जमा होगी।
‘खुले पैसे’ के बोझ तले दबने को मजबूर
सरकार और प्रशासन से सवाल यह है कि मुंबई जैसे महानगर में क्या एक प्रतिष्ठित सार्वजनिक संस्था कर्मचारियों को इस तरह ‘खुले पैसे’ के बोझ तले दबाने को मजबूर करेगी? क्या यह आर्थिक कुप्रबंधन नहीं, बल्कि कर्मचारियों की गरिमा पर चोट नहीं है?
