लीक हो गए पेपर सारे,
रोते हैं बच्चे सब प्यारे।
देखो उस सूरज-चंदा को,
दिन में ही दिखा दिए तारे।
लीक…………
1.
व्यर्थ ही समय गया सारा,
फिर से तैयारी दोबारा।
जीत का किसको दें तोहफा,
यहां तो हर कोई हारा।
इकट्ठे होकर नर-नारी,
लगा लें कितने ही नारे।
लीक…………
2.
आत्महत्या करते बच्चे,
भले ही बुरे या हों अच्छे।
एक पल में ही ढह जाएं,
ऐसे सबके मकान कच्चे।
आने वाले कल को थप्पड़,
आज ने इतने हैं मारे।
लीक………….
3.
युवा पीढी से हो चर्चा,
समय का व्यर्थ न हो खर्चा।
देशहित में सारे सोचें,
न छापो ऐसा कुछ पर्चा।
पकड़े जाने पर सबके तो,
कैसे हो गए वारे-न्यारे।
लीक…………
4.
देश सबका, सब हैं अपने,
भविष्य के पूरे हों सपने।
व्यर्थ के शोर-शराबे से,
धरती भी लगती है तपने।
शब्द ऐसे न कभी बोलो,
लगें जो मीठे या खारे।
लीक………….
वरिष्ठ कवि एवं व्यंग्यकार
प्रदीप नवीन, इंदौ
