सना खान
मॉल, होटल, अस्पताल या किसी ऊंची इमारत की लिफ्ट में जाते समय आपने एक बात जरूर नोट की होगी कि अंदर चारों तरफ लगे बड़े-बड़े शीशे। ज्यादातर लोग इन्हें सिर्फ सजावट समझते हैं, लेकिन इसके पीछे विज्ञान और मनोविज्ञान से जुड़ा एक दिलचस्प राज छिपा है। दरअसल, बहुत-से लोगों को बंद जगहों में घबराहट महसूस होती है। इस स्थिति को क्लॉस्ट्रोफोबिया कहा जाता है। लिफ्ट का छोटा-सा बंद कमरा कई बार लोगों को असहज कर देता है। ऐसे में शीशे लिफ्ट को बड़ा और खुला दिखाते हैं, जिससे बेचैनी कुछ हद तक कम हो जाती है।
इसके पीछे एक और मजेदार कारण है। कुछ साल पहले कई देशों में लोगों ने शिकायत की कि लिफ्ट बहुत धीमी चलती है। इंजीनियरों ने जब इसकी जांच की, तो पता चला कि असली समस्या लिफ्ट की रफ्तार नहीं, बल्कि लोगों का बोर होना था। इसके बाद लिफ्ट में शीशे लगाए जाने लगे। हुआ यह कि लोग इंतजार करने के बजाय शीशे में खुद को देखने, बाल संवारने, कपड़े ठीक करने या मोबाइल देखने में व्यस्त हो गए। नतीजा यह निकला कि वही लिफ्ट, जो पहले धीमी लगती थी, अब लोगों को पहले से तेज महसूस होने लगी। शीशे सुरक्षा के लिहाज से भी काफी उपयोगी होते हैं। इनकी मदद से लोग अपने आसपास की गतिविधियों पर आसानी से नजर रख सकते हैं। इससे उन्हें अधिक सुरक्षित महसूस होता है।
दिलचस्प बात यह है कि दुनिया की कई आधुनिक इमारतों में लिफ्ट के शीशे सिर्फ सुंदरता बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि लोगों के अनुभव को बेहतर और आरामदायक बनाने के लिए लगाए जाते हैं। तो अगली बार जब आप लिफ्ट में जाएं और अनजाने में शीशे में खुद को निहारने लगें, तो मुस्कुरा दीजिए। हो सकता है, यही वह छोटी-सी तरकीब हो, जिसने कुछ मिनटों के सफर को आपके लिए आसान और दिलचस्प बना दिया हो।
