मुख्यपृष्ठस्तंभगजबे है: ...क्योंकि कैदी भी कभी जेलर थी...!

गजबे है: …क्योंकि कैदी भी कभी जेलर थी…!

-उमा सिंह
कहते हैं, समय बड़ा बलवान होता है। वक्त जब पलटी मारता है, तो बड़े-बड़ों की अकड़ को भी ऐसे तह करके रख देता है, जैसे थाने में किसी की शिकायत वाली अर्जी। कल तक जिनके तन पर खाकी, हाथों में डंडा और चेहरे पर ऐसा रौब रहता था कि कैदी की आवाज भी सलाखों के पीछे सहम जाती थी, आज उन्हीं मैडम को जेल की चारदीवारी के भीतर रहना पड़ रहा है। गजब है न! कुर्सी बदली, किरदार बदला और जिंदगी ने पूरी पटकथा ही बदल दी।
मामला राजस्थान की पूर्व जेलर दिव्या चौधरी का है। आरोप है कि उन्होंने दो महिला बंदियों को नियमों के विरुद्ध जेल से बाहर निकालकर अपने निजी फ्लैट पर घरेलू काम में लगाया। यानी जिन बंदियों को सुधारने की जिम्मेदारी थी, उन्हीं से घर का काम कराने का आरोप लग गया। वाह रे व्यवस्था, जेल के भीतर कैदी और बाहर घरेलू सहायिका, कानून की किताब शायद जेलर मैडम के लिए किसी दूसरे विभाग में रखी थी। खबरों के मुताबिक, एफआईआर के बाद करीब दो महीने तक फरारी चली और आखिरकार कोटा से गिरफ्तारी हुई। अब मैडम जी को अदालत ने न्यायिक हिरासत में भेज दिया। अब जरा वक्त का तमाशा देखिए, कल तक मैडम दूसरों की हाजिरी लगवाती थीं, आज खुद हाजिरी और पेशी के इंतजार में हैं। कल तक सवाल पूछती होंगी, ‘नियम तोड़ा क्यों?’ आज कानून पूछ रहा है, ‘मैडम, नियम आपके लिए अलग थे क्या?’ सच तो यह है कि वर्दी ताकत दिखाने का तमगा नहीं, जिम्मेदारी निभाने की शपथ है। सरकारी कुर्सी निजी जागीर नहीं और बंदी किसी की घरेलू नौकरानी नहीं! हालांकि, आरोप साबित होना अभी बाकी है, लेकिन संदेश साफ है कि कानून की नजर में पद बड़ा नहीं, कानून बड़ा होता है।

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