गजल

जितना बड़ा आदमी उसकी सोच उतनी छोटी है
जितनी बड़ी बातें बनाएं उतनी महक फीकी है
तुम किसी का नुक्स निकालो पहले अपने अंदर का शख्स देखो
तुम गौर करो तुमने अपनी जिंदगी वैâसे जीनी है
मौकापरस्त वालों को मत दो मौका मुक्काशद करनेवालों ने खाया है धोखा
मेहनतकश वालों ने जिंदगी वैâसे जीनी है
जीने का ये दस्तूर है चलना आदमी का फितरत है
बस कंटीली राहों ने पैरों की उंगलियां कितनी छीनी है
एक र्इंट लगा लो घरौंदा बना लो धन को तुम व्यर्थ न उछालो
जल्दी आओ मिट्टी अभी गीली है
सरहद पर फौजी करता है खाता है गोली की बौछार
बस एक-दूसरे की जिंदगी छीनी है
तरुवर पर बैठा पंछी मल्हार गाता है
उसके मन को क्या भाता है
उसकी समझ में सब कुछ आता है उसकी समझ भी तीखी है
– अन्नपूर्णा कौल, नोएडा

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