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गरमी मऽऽऽ गांव कइसे जाइ? …सफर बना सजा! …ट्रेनों में ठुंस-ठुंसकर यात्रा को मजबूर यात्री

भीषण गर्मी, लंबी वेटिंग और भारी भीड़ से लोग बेहाल
द्रुप्ति झा / मुंबई
उत्तर भारत की भीषण गर्मी और रेलवे की बदहाल व्यवस्था ने आम यात्रियों के लिए रेल सफर को किसी ‘अग्निपरीक्षा’ से कम नहीं छोड़ा है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों के लिए कन्फर्म टिकट मिलना अब लॉटरी लगने जैसा हो गया है। स्लीपर और थर्ड एसी कोचों में वेटिंग लिस्ट ४००-५०० के पार पहुंच रही है, जो ज्यादातर मामलों में कन्फर्म ही नहीं हो पाती। वहीं तत्काल बुकिंग खुलते ही कुछ ही सेकंड में सीटें खत्म हो जाती हैं, जिससे टिकटों की कालाबाजारी पर भी सवाल उठ रहे हैं।
ट्रेनों के अंदर की स्थिति भी बेहद चिंताजनक हो चुकी है। आरक्षित डिब्बों में वेटिंग और बिना टिकट यात्रियों की इतनी भीड़ रहती है कि कन्फर्म सीट वाले यात्रियों को अपनी सीट तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। कई बार यात्रियों को शौचालय तक जाने की जगह नहीं मिलती। कोच के दरवाजों पर लटककर सफर करते लोग और फर्श पर लेटे यात्री किसी भी आपात स्थिति में बड़े हादसे का कारण बन सकते हैं।
भीषण गर्मी ने यात्रियों की परेशानी और बढ़ा दी है। जब तापमान ४५ से ४८ डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा हो, तब स्लीपर कोच किसी भट्ठी जैसे महसूस होते हैं। गर्म हवा के थपेड़े, खराब पंखे और ठंडे पानी की कमी यात्रियों की मुश्किलें बढ़ा रही हैं। रेलवे द्वारा चलाई जा रही ‘समर स्पेशल’ ट्रेनें भी बढ़ती आबादी और प्रवासी यात्रियों की भारी संख्या के सामने नाकाफी साबित हो रही हैं।
टिकट के लिए मारामारी
पवन एक्सप्रेस से बिहार जाने वाले एक यात्री ने बताया कि ट्रेन में भीड़ का आलम यह है कि दो महीने पहले बुक कराया गया टिकट भी कन्फर्म नहीं हो पाता। उन्होंने कहा कि सरकार को ट्रेनों की संख्या बढ़ाने और व्यवस्थाओं में सुधार करने की जरूरत है। लोगों को शादी, बीमारी या किसी इमरजेंसी में गांव जाना पड़ता है, लेकिन रेलवे की बदहाल स्थिति के कारण कई बार उन्हें अपनी यात्रा तक टालनी पड़ती है।

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