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कैसे सत्य संभाला हमने

कैसे सत्य संभाला हमने।
सच्चाई को पाला हमने ।।
अपने ही मन के भंड़ास को।
बाहर खूब निकाला हमने ।।
भीतर के अंधेरों पर ही।
हरदम किया उजाला हमने।।
निर्मल रहना रहा जरूरी ।
खुद को ही धो डाला हमने।।
अपने ही उत्तम विचार को।
हरदम देखा-भाला हमने ।।
कई दिनों से खुद जबान कर।
लगा लिया था ताला हमने ।।
सदा सही को गले लगाया ।
और गलत को टाला हमने।।
शोषण के सारे विधान को ।
सदा कहा है काला हमने।।
परिवर्तन लाने के खातिर।
खुद को खूब उबाला हमने।।
कहना जब भी रहा जरूरी।
रुका नहीं कह डाला हमने।।
खुशहाली का मौसम आए।
यही शौक है पाला हमने।।
-अन्वेषी

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