‘बरखा रानी बरखा रानी।
कब बरसोगी बरखा रानी’
तथा
‘काल कलौती उज्जर धोती
काले मेघा पानी दे’
जैसे गीतों को गाते लोगों के जुबान नहीं थक रहे थे। धान के बेहन को रोपने का समय था। बारिश हो जाती तो भराई नहीं करनी पड़ती इसी उम्मीद में इंद्र देव को प्रसन्न करने हेतु जितने भी काव्य रचे गये, उनमें से जितनी की भी जानकारी गाँव वालों को थी, लगभग सभी को गाकर गाँव वाले हार गए थे पर बारिश का नामोनिशान तक नहीं था। बेहन को उखाड़ कर खेत में जमा कर दिया गया था उधर जिस खेत में रोपाई करनी थी मशीन से पानी भरा जा रहा था। लाखन, हीरा, मजनू सहित करीब बीस लोग धान रोपाई के इस कार्य में लगे हुए थे। कोई बेहन उखाड़ने में तो कोई बेहन को पहुँचाने में लगा हुआ था तो कोई रोपाई कर रहा था। उत्साह उत्सव सा माहौल था। हेंगा से खेत को समतल किया जा चुका था। बैल किनारे बैठे पाग्गुर मल रहे थे। अपने काम को निपटा कर वो मगन थे। घुटनों तक डूबे लोग खेल-खेल कर धान की रोपाई कर रहे थे। महिलाएं गीत-गवनई में मगन थीं साथ ही धान लगाने का काम भी जारी था। काफी देर बीत गया या कहें कि धान लगाते-लगाते दिन चढ़ आया था पर चना चबैना का जुगाड़ नहीं हो सका था। लोग मन ही मन गुस्सा रहे थे पर बात दादी की थी बेचारी अकेली दादी कैसे करती सब कुछ इसलिए कुछ देर बाद लोगों ने दाना पानी की उम्मीद ही छोड़ दी थी। ददा किसी काम से बेटे के पास बंबई गए हुए थे। अब तक आ जाना था पर नहीं आ सके थे, तार भी नहीं आया था कुछ। खैर कुछ देर और बीता ही था कि दादी दौरा में चना और लाई लेकर आती दिख गईं। झब्बर साथ में ही था बाल्टी भर कर रस लिए चला आ रहा था। सभी के चेहरे खिल उठे। देखते ही खेत के बाहर बबूल तले झुंड बनाकर बैठ गये लोग। हाथ धुल कर लोग दाना और रस करने लगे। मिट्टी में सने होने के बावजूद खुश मन से लोगों का मिल बाँट कर खाना आनंद की पराकाष्ठा को प्राप्त कर रहा था। दादी भी मन ही मन मगन थीं। किसानी का मजा ऐसे ही आता है बस उसे महसूस करने वाला हो। बगल ही तालाब आसमान से पानी की उम्मीद लिए उधर ही निहारे जा रहा था पर इधर के हलचल को देख उसमें भी शामिल होना चाहा पर मजबूर था कि वो बिना पानी के था। सोचने लगा कि काश मेरे पास जल होता तो आज ये सभी यहीं बैठकर मिल बाँट कर खा रहे होते मैं भी शरीक हो जाता इनके खुशियों में पर..। काश..।
बेचारा तालाब दुःख में एक कोने दुबक कर बैठा रहा। बबूल, आम सब मुंह चिढ़ा रहे हों जैसे।
उधर चबैना के बाद लोग फिर अपने काम में लग गए थे। दादी वापिस घर जा चुकी थी। शाम होते-होते धान पूरे खेत में श्रृंगार किए फैल गया, खेत जो एकदम उजाड़ सफ़ेद नजर आ रहा था बिल्कुल ही हरा-भरा हो उठा। सावन की तैयारी दिखने लगी खेत में। लोग घर जा चुके थे दादी सभी के लिए पूड़ी, सब्जी और खीर बनाईं थी। खाकर लोग अपने-अपने घरों को चल दिए। रात करीब आठ बजे होंगे जब बूँदा-बांदी शुरू हुई थी उसके बाद तो पूरी रात वो बारिश हुई कि सुबह तक होती ही रही। दादी सुबह उठते ही पहले खेत के पास भागी। बेहन बह गया था। तालाब में तैरते बेहन वहाँ की शोभा बढ़ा रहे थे। तालाब और खेत सब का पानी बराबर ही दिख रहा था। जहाँ तक निगाह जाती पानी ही पानी। बाढ़ सब कुछ बहा ले गया था, नहीं बही थी तो बस दादी की उम्मीद। बेहन अभी बहुत थी दुबारा से धान रोपाई हुई। कहते हैं कि उस बार जितना धान ना तो पहले कभी हुआ था और ना ही उसके बाद कभी हो सका।
पंकज तिवारी
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं
कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)
