हिमांशु राज
सतना (मध्य प्रदेश) में जन्मीं प्रतिभा पाण्डेय, जिन्हें साहित्यिक रूप से प्रतिभा “प्रीति” के नाम से जाना जाता है, हिन्दी लेखन की वह संवेदनशील आवाज़ हैं, जो गद्य व पद्य दोनों में स्थायी छाप छोड़ती हैं। 1 दिसंबर 1981 को जन्मीं प्रतिभा ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा मैहर (जिला सतना) से प्राप्त की और उच्च शिक्षा के लिए प्रयागराज आकर हिन्दी साहित्य में एम.ए. व एम.फिल. की उपाधि अर्जित की। शिक्षण के क्षेत्र में कार्यरत रही प्रतिभा आज गृहिणी होते हुए लेखन और साहित्यिक कार्यक्रमों से जुड़ी हुई हैं।
पारिवारिक जीवन की जड़ें गहरी हैं। पिता श्री रमा प्रसाद शुक्ल तथा माता श्रीमती सुशीला देवी के स्नेह व मार्गदर्शन ने उनके साहित्यिक विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उनका वैवाहिक जीवन श्री राकेश पाण्डेय के साथ है और उनके दो पुत्र—अभिनव व आयुष—परिवार के सुख-दुख के साथी हैं। स्थायी निवास प्रयागराज के चांदपुर सलोरी में है तथा वर्तमान में वे सुल्तानपुर की ऑफिसर्स कॉलोनी में रहती हैं।
लेखन प्रतिभा का जीवन-आधार है। गद्य तथा पद्य-दोनों में सक्रिय रहकर वे जीवन की सूक्ष्म दृष्टियों और मानवीय संवेदनाओं को सहजता से पाठक तक पहुंचाती हैं। कविता-पाठों में उनकी अभिव्यक्ति की नाज़ुकता और गद्य रचनाओं में समाज-जीवन का सूक्ष्म निरीक्षण उनकी विशेषता है। गृह-प्रबंधन और पर्यटन उनके लेखन के अन्य आयाम हैं, जिनसे उनके लेखों में स्थानीय संस्कृति और पारिवारिक जीवन की झलक मिलती है।
उनकी रचनाएँ अनेक ई-पत्रिकाओं तथा समाचार-पत्रों में प्रकाशित हो चुकी हैं। 2004–2005 में प्रतिष्ठित समाचार-पत्र “राष्ट्रीय सहारा” में उनकी रचना का प्रांतीय व राष्ट्रीय स्तर पर चयन एवं पुरस्कार हुआ। इसके अतिरिक्त लगभग 300 से अधिक आभासी व जमीनी मंचों द्वारा उन्हें सम्मान-पत्र प्रदान किए गए हैं, जो उनकी साहित्यिक सक्रियता और व्यापक पहुँच का प्रमाण हैं। शिक्षिका रहे अनुभव ने उनके लेखन में संवादात्मक सहजता और सामाजिक संवेदनशीलता जोड़ दी है।
नारी के अस्तित्व, अधिकार और स्वाभिमान पर उनका एक सशक्त गीतमय काव्य—“नारी का अस्तित्व”—आज के समय की नारी-छवि का सघन चित्र प्रस्तुत करता है। यही कविता प्रस्तुत है:
“नारी का अस्तित्व”
मत मानिए महज हमें कविता श्रृंगार की,
चिंगारियाँ भी हम हैं दहके अंगार की!
हम नारियां दया के पात्र हैं न समझिए,
अबला नहीं हम शक्ति हैं खंजर की धार की!!
असुरों के लिए हममें दुर्गा की शक्ति है,
चंडी समान शौर्य है क्षमता संहार की!
वीरांगनाएँ हैं हम भारत की नारियां,
लक्ष्मी की तरह पूजित प्रतिमा संसार की!!
आँगन में हम हैं तुलसी तो द्वार पर कलश,
मंदिर में अपने प्रिय की ‘प्रतिभा’ हैं प्यार की!
आदर्श सद्विचारों व सदाचार की,
जीवंत मूर्ति हम हैं ममता-दुलार की!!
ज्वाला है, चांदनी भी, पाँखुरी भी फूल की,
आँधी, कभी छुवन हम शीतल बयार की!
तस्वीरों, विज्ञापनों में हमें मत बनाइए,
व्यापारिक सामग्री अपने प्रचार की!!
अधिकार याचना के बाद छीनना पड़े,
हम चाहती नहीं हलचल हो कोई इस प्रकार की।
प्रतिभा पाण्डेय
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश
यह काव्य रचना नारी के पारंपरिक तथा आधुनिक रूपों को एक साथ प्रस्तुत करती है—ममता की कोमलता और संघर्षशील शक्ति का समन्वय। प्रतिभा की भाषा सरल, प्रभावी और भावनात्मक है, उनके शब्द सामाजिक संवेदनाओं को जागृत करते हैं और पाठक को सोचने पर विवश करते हैं कि नारी केवल श्रृंगार-आइकन नहीं, समाज की चेतना और शक्ति भी है।
प्रतिभा पाण्डेय का साहित्यिक सफर उसी मिट्टी की मिसाल है, जिसमें परंपरा, संस्कृति और आधुनिक सोच का समन्वय सहज है। उनकी कलम से निकली रचनाएँ आगे भी पाठकों के मन में मानवीयता और सामाजिक चेतना का द्योतक रहेंगी।
