साहब सिंह
उत्तर प्रदेश विधानसभा में राम मंदिर में कथित चंदा चोरी के आरोपों पर चर्चा की मांग को स्वीकार न किया जाना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। लोकतंत्र में किसी भी सार्वजनिक महत्व के मामले पर चर्चा से बचना समाधान नहीं हो सकता। यदि किसी संस्था या परियोजना से जुड़े आर्थिक लेन-देन पर सवाल उठते हैं, तो उनका सबसे प्रभावी उत्तर पारदर्शिता और निष्पक्ष जांच होती है, न कि चर्चा से परहेज। विधानसभा अध्यक्ष द्वारा यह पूछना कि आरोप लगाने वाले पहले दान की रसीद दिखाएं, भी बहस का विषय बन गया है। यदि किसी मामले में अनियमितता के आरोप लगाए जा रहे हैं, तो उनका परीक्षण तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए। चर्चा की अनुमति देने या न देने का निर्णय आरोप लगाने वाले व्यक्ति की हैसियत से नहीं, बल्कि मुद्दे की गंभीरता से तय होना चाहिए।
जो लोग रामराज्य की बात करते हैं, उनसे जनता की अपेक्षाएं भी अधिक होती हैं। रामराज्य का मूल आधार न्याय, सत्य, निष्पक्षता और जवाबदेही माना जाता है। ऐसे में यदि किसी धार्मिक या सार्वजनिक संस्था के धन के दुरुपयोग के आरोप सामने आते हैं, तो उन्हें दबाने या टालने के बजाय पूरी पारदर्शिता के साथ जांच कराना ही उन आदर्शों के अनुरूप होगा।
यदि वास्तव में चंदे के दुरुपयोग जैसा कोई मामला हुआ है, तो यह केवल आर्थिक अपराध नहीं बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास पर भी आघात है। मंदिर में दिया गया दान केवल धन नहीं होता, बल्कि लोगों की आस्था, विश्वास और भावनाओं का प्रतीक होता है। इसलिए ऐसे आरोपों की निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है, ताकि सच सामने आ सके और जनता का भरोसा बना रहे।
दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि आरोप लगाने वाले कुछ लोगों ने यह दावा किया है कि उन्हें धमकियां दी जा रही हैं, उनके खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं और उन्हें विभिन्न तरीकों से दबाव में लाने का प्रयास किया जा रहा है। यदि ऐसे आरोप सही हैं, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है। किसी भी लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं हो सकता और न ही आलोचना का उत्तर भय या दबाव होना चाहिए। इन दावों की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
यह भी समझना होगा कि आस्था किसी व्यक्ति या संस्था को जवाबदेही से मुक्त नहीं करती। धार्मिक वेशभूषा, सामाजिक प्रतिष्ठा या राजनीतिक प्रभाव किसी को कानून से ऊपर नहीं बना सकते। यदि आरोप निराधार हैं, तो स्वतंत्र जांच उन्हें खारिज कर देगी। और यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए, चाहे उनका पद, प्रभाव या पहचान कुछ भी हो।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह सवाल पूछने की अनुमति देता है और सत्ता से जवाब मांगता है। आस्था का सम्मान तभी सुरक्षित रह सकता है, जब उसके नाम पर उठने वाले हर गंभीर प्रश्न का उत्तर पारदर्शिता, निष्पक्ष जांच और न्याय के माध्यम से दिया जाए। किसी भी समाज में विश्वास बनाए रखने का यही सबसे प्रभावी और लोकतांत्रिक रास्ता है।
