उम्र तमाम गुमनामी में गुजारी,
अब नाम जानकर क्या करोगे।
कांटों भरी डगर पर ताउम्र नंगे पांव चला,
अब बिवाइयों पर मरहम लगाकर क्या करोगे।
भरी जवानी रुसवा कर गए थे,
साथ निभाने के वादों का अब क्या करोगे।
दिल की बातें तुमने कभी सुनी ही नहीं,
फरियाद न करने की तोहमत लगाने का क्या फायदा।
अंधेरी रातों में अकेले रहने की आदत पड़ गई है,
खिड़कियों से अब पर्दे हटाने का क्या फायदा।
कमरे की दीवारों से बातें करता रहा हूं,
मेरा मुंह खुलवाने का क्या फायदा।
जिन नजरों ने परखना छोड़ दिया,
रात के चांद-सितारे दिखाने का क्या फायदा।
-बेला विरदी
