शायराना अंदाज लिखना चहाती हूं
आशिक मिजाज बनना चाहती हूं
परी बन के शहजादा तलाशना चाहती हूं
कुछ बोलना, कुछ लिखना चाहती हूं
दिल को धडकाना चाहती हूं
किसी के प्यार में घुलना चाहती हूं
गिले-शिकवे दूर करना चाहती हूं
किसी के आस-पास फड़कना चाहती हूं
बहारों को हाथों में समेटना चाहती हूं
गुलों को गुलशन में महकाना चाहती हूं
किसी की पलकों में बस के
उसके ख्वाबों को रंगीन बनाना चाहती हूं
किसी के गीतों में तरन्नुम
बन के लहराना चाहती हूं
बारिश में नाव चला कर
बचपन दोहराना चाहती हूं
किसी की दया का पात्र
न बन के खुद कमाना चाहती हूं
नाकारा कहने वालों को
सबक सिखाना चाहती हूं
रेखाओं में न बंध के
खुले आकाश में उड़ना चाहती हूं
जीवन में कुछ हासिल कर के
कुछ पाना चाहती हूं
डंके की चोट पर अपनी
हैसियत का झंडा गाड़ना चाहती हूं
नाकामियों को खदेड़ना चाहती हूं
अपनी हिम्मत से कुछ रत्न पाना चाहती हूं।
-अन्नपूर्णा कौल, नोएडा
