मुख्यपृष्ठस्तंभबातों-बातों में :  नीट का हेलिकॉप्टर!

बातों-बातों में :  नीट का हेलिकॉप्टर!

एमएमएस

नीट के पेपर लीक क्या हुए सारे देश में बवाल मच गया, हंगामा ही हो गया। दरअसल, इसमें हंगामा मचाने जैसी कोई बात नहीं थी क्योंकि यह पहली बार नहीं हुआ था। पेपर लीक होते रहे, बच्चों को फिर से री-एग्जाम देने पड़े, बच्चों को मानसिक तकलीफ हो, पेरेंट्स की नींद हराम हो, निराशा में बच्चे कोई जानलेवा कदम उठा लें, क्या ही फर्क पड़ता है…?
यहां कोई लालबहादुर शास्त्री तो बैठे नहीं हैं, जो एक रेल एक्सीडेंट की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दें! बड़े पापड़ बेलने पड़ते हैं इस कुर्सी को पाने के लिए, कोई एक झटके में इसे कैसे छोड़ दे भाई? पहले तो खूब लीपापोती हुई, गलती किसकी है, यह एक बड़ा यक्ष प्रश्न बन गया था। इस बीच सीबीएसई का भी जिन्न निकल आया और पूरे एजुकेशन सिस्टम पर थू-थू होने लगी। दुनियाभर में छीछालेदर होने के बाद जब पानी सिर से ऊपर चला गया, तब जाकर प्रधानसेवक के प्रधान को याद आया कि नीट को सिस्टमैटिक करने के लिए बहुत कुछ हो सकता है। बचपन में चाचा चौधरी की कॉमिक्स में पढ़ा करते थे कि चौधरी का दिमाग कंप्यूटर से भी तेज चलता है। यहां प्रधान का दिमाग तो चाचा चौधरी से भी दो कदम आगे निकला। क्या `अंधेर नगरी चौपट राजा’ के दौर में ऐसा जबरदस्त आइडिया किसी को सूझा था? शायद दुनिया में पहली बार ऐसा क्रांतिकारी विचार आया है। अब नीट के पेपर एयर फोर्स के हेलिकॉप्टर डिलीवर करेंगे! मित्र ट्रंप आप सुन रहे हैं ना…अरे आप तो ईरान के चक्कर में खुद चक्करघिन्नी बने हुए हैं, आपको क्या पता कि असली सिक्योरिटी और सुरक्षा क्या चीज होती है, वरना आपके व्हाइट हाउस में सरेआम गोलीबारी थोड़े ही न होती! हमारे यहां तो पेपर लीक रोकने के लिए तोप से मक्खी मारी जा रही है। गजब का मास्टरस्ट्रोक है, रस्सी जल गई पर बल नहीं गया। सिस्टम को सुधारने, पारदर्शी बनाने या लीक करने वाले मगरमच्छों को पकड़ने की जहमत कौन उठाए? सारा तामझाम हेलिकॉप्टर उड़ाने में लगा दिया। वाह! अब आसमान से पर्चे बरसेंगे और जमीन पर किस्मत। सचमुच, देश `विश्व गुरु’ बनने की राह पर है, भले ही शिक्षा का बेड़ा गर्क हो जाए!
विकास के नाम पर जंगल साफ!
बधाई हो! आखिरकार आदिवासियों और पर्यावरणविदों की जिद हार गई और `विकास’ की जीत तय हो गई। अब हमारे देश के फेफड़ों (हसदेव अरण्य) को थोड़ी खुली हवा मिलेगी, वही हवा जो कंक्रीट के जंगलों और कोयले की धूल से शुद्ध की जाती है।
वैसे, कुछ नासमझ लोग ४.४८ लाख पेड़ों के काटे जाने पर आंसू बहा रहे हैं। अरे भाई, थोड़ा विजन बड़ा रखिए! इतने सारे पेड़ होने से वहां कितनी अव्यवस्था थी, चारों तरफ हरियाली, जंगली जानवर और शुद्ध ऑक्सीजन। क्या कोई सभ्य समाज ऐसे रह सकता है? इन पेड़ों को हटाकर वहां बेहतरीन गड्ढे बनाए जाएंगे, जहां से काला सोना (कोयला) निकलेगा। आखिर बिजली के बिना आपका एयर कंडीशनर कैसे चलेगा, जिससे आप बैठकर `ग्लोबल वॉर्मिंग’ पर चिंता जताते हैं? आदिवासी भी अजीब हैं, अपनी जल-जंगल-जमीन के लिए अड़े हुए हैं। उन्हें समझना चाहिए कि जंगलों में रहने से कोई `स्मार्ट’ नहीं बनता। जब जंगल कटेंगे, तब उन्हें भी शहरों के लेबर चौकों पर खड़े होने का और विकास की मुख्यधारा से जुड़ने का `सुनहरा अवसर’ मिलेगा।
स्टेज-I की मंजूरी मिल चुकी है, स्टेज-II भी बस रास्ते में है। इतिहास के पन्नों में जब यह लिखा जाएगा, तो सुनहरे अक्षरों में चमकेगा कि कैसे हमने ऑक्सीजन देने वाले पेड़ों को काटकर देश की तिजोरी को `ऊर्जावान’ बनाया था। पेड़ों का क्या है, वो तो कागज के नोटों पर भी छप ही जाते हैं…!

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