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संस्कृत में समाया भारत का जीवन-दर्शन :  संस्कृत सप्ताह समारोह में मेधावी छात्र-छात्राओं, विद्वानों व शिक्षकों का सम्मान

राजेश सरकार / प्रयागराज

संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की हजारों वर्ष पुरानी ज्ञान, संस्कृति और जीवन-दृष्टि की संवाहक है। इसके ज्ञान से देश की समृद्ध विरासत को सहज ही समझा जा सकता है। आज दुनिया के अनेक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में संस्कृत पर अध्ययन और शोध हो रहा है। ऐसे में भारत में संस्कृत के संरक्षण, संवर्धन और व्यापक प्रसार के लिए विशेष प्रयास जरूरी हैं। यह बात राज्य स्तरीय संस्कृत सप्ताह समापन समारोह-2026 के मुख्य अतिथि अपर मुख्य सचिव, माध्यमिक एवं बेसिक शिक्षा पार्थ सारथी सेन शर्मा ने जिला पंचायत सभागार में कही। उन्होंने कहा कि बदलते समय में संस्कृत को आधुनिक तकनीक और नई शिक्षा व्यवस्था से जोड़कर इसकी उपयोगिता और पहुंच को और व्यापक बनाया जा सकता है। समारोह की अध्यक्षता कर रहे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. गिरीशचंद्र त्रिपाठी ने कहा कि भारत महज एक भू-खंड नहीं, बल्कि आचार, दर्शन और जीवन के उत्कृष्ट आयामों की भूमि है। भारत की इस विशिष्ट दृष्टि और जीवन-दर्शन को समझने का सबसे सशक्त मार्ग संस्कृत से होकर गुजरता है।
सेवानिवृत्त आईएएस एस.के. पाण्डेय ने संस्कृत को रोजगार से जोड़ने पर जोर देते हुए कहा कि इस क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर पैदा कर इसके अध्ययन और संवर्धन को नई गति दी जा सकती है। वहीं उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद के सचिव भगवती सिंह ने कहा कि किसी भी भाषा का वास्तविक विकास उसके अध्ययन-अध्यापन की गुणवत्ता पर निर्भर करता है।
प्रतिभाओं को मिला सम्मान
समारोह में संस्कृत प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले छात्र-छात्राओं को पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। संस्कृत गीता पाठ में संस्कार प्रथम और आयुष द्वितीय रहे। गीत प्रतियोगिता में उत्सव त्रिपाठी ने प्रथम तथा ओम तिवारी ने द्वितीय स्थान प्राप्त किया। अन्त्याक्षरी प्रतियोगिता में अनमोल प्रथम और विवेकानंद द्वितीय रहे।
उप शिक्षा निदेशक (संस्कृत) डॉ. ब्रजेश मिश्र ने अतिथियों का स्वागत किया। उत्तर प्रदेश माध्यमिक संस्कृत शिक्षा परिषद के सचिव ओम प्रकाश त्रिपाठी ने तकनीक और एआई के बढ़ते प्रभाव के दौर में संस्कृत को संस्कार का आधार बताया। आयोजन को सफल बनाने में प्रधान निरीक्षक, संस्कृत पाठशालाएं पवन कुमार श्रीवास्तव का विशेष योगदान रहा।
इस अवसर पर प्रो. सुरेंद्र पाल सिंह, अरविंद शास्त्री, डॉ. विनोद कुमार मिश्र, डॉ. सालिकराम त्रिपाठी, डॉ. अरुणेश मिश्र, यशवंत कुमार द्विवेदी, डॉ. राजेश मिश्र ‘धीर’, डॉ. मुकेश त्रिपाठी समेत अनेक विद्वानों और शिक्षकों को सम्मानित किया गया।

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