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अंदर की बात: दिल्ली का धुआं, संसद का सन्नाटा और शेयर बाजार का झटका

राजन पारकर

दिल्ली की सड़कों पर उबलता जनाक्रोश, संसद के भीतर ठप लोकतंत्र और शेयर बाजार में ब्लैक मंडे का तूफान—ये तीनों घटनाएं भले ही अलग-अलग दिखाई दें, लेकिन राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि इनके तार कहीं न कहीं सत्ता की कार्यशैली, प्रशासनिक निर्णयों और जनता के बढ़ते असंतोष से जुड़ते हैं। सूत्रों के अनुसार, सरकार इन घटनाओं को अलग-अलग मान रही है, जबकि विपक्ष इन्हें जनता की बेचैनी का संकेत बता रहा है। सवाल यह है कि क्या यह केवल एक दिन का तूफान है या आने वाले राजनीतिक मौसम का ट्रेलर?
ब्लैक मंडे या भरोसे की ब्लैक आउट?
शेयर बाजार में ७०० अंकों की गिरावट को सरकार वैश्विक परिस्थितियों का परिणाम बता रही है। यह बात अपनी जगह सही हो सकती है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि निवेशक केवल युद्ध नहीं देखते, वे सरकार की राजनीतिक स्थिरता और नीति का भरोसा भी तौलते हैं। सूत्रों के अनुसार, मंत्रालय के कुछ आर्थिक सलाहकार भी मानते हैं कि लगातार राजनीतिक टकराव, संसद का ठप होना और अनिश्चित माहौल विदेशी निवेशकों को असहज करता है। बाजार का स्वभाव बड़ा विचित्र होता है। उसे भाषण नहीं, भरोसा चाहिए। वह नारे नहीं, नीति देखता है। जब संसद से समाधान की जगह शोर सुनाई देता है तो दलाल स्ट्रीट की स्क्रीन पर लाल रंग छा जाता है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि यदि वैश्विक संकट लंबा चला और घरेलू राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी तो आने वाले दिनों में बाजार पर दबाव और बढ़ सकता है।
संसद बंद, लोकतंत्र भी स्थगित?
लोकसभा छह बार और राज्यसभा पांच बार स्थगित हुई। आखिर सवाल उठता है कि संसद बहस के लिए है या केवल हंगामे की औपचारिकता निभाने के लिए? सूत्रों के अनुसार, सत्ता पक्ष चाहता था कि पहले सरकारी कामकाज चले, जबकि विपक्ष जनता के मुद्दों पर तत्काल चर्चा चाहता था। नतीजा यह हुआ कि न सरकार अपनी बात कह सकी और न विपक्ष जनता की। जहां संवाद मरता है, वहां शोर पैदा होता है।’ आज संसद में वही दृश्य दिखाई दिया। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि अधिवेशन के शुरुआती दिनों में यही स्थिति बनी रही तो कई महत्वपूर्ण विधेयक और आर्थिक निर्णय भी प्रभावित हो सकते हैं।
सड़क पर लाठी, सत्ता के दरवाजे पर खामोशी
दिल्ली की सड़कों पर युवाओं का गुस्सा, पुलिस का लाठीचार्ज, आंसू गैस और मेट्रो स्टेशनों का बंद होना, ये किसी लोकतांत्रिक उत्सव की तस्वीर नहीं, बल्कि व्यवस्था की बेचैनी का आईना है। सूत्रों के अनुसार, सरकार कानून-व्यवस्था बनाए रखने की मजबूरी बता रही है, जबकि आंदोलनकारी इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रहार कह रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि प्रशासन को सबसे अधिक चिंता आंदोलन से नहीं, बल्कि उस आंदोलन की देशव्यापी प्रतिध्वनि से है। इसलिए सुरक्षा व्यवस्था अभूतपूर्व स्तर पर रखी गई। लोकतंत्र में बैरिकेड सड़कें रोक सकते हैं, लेकिन सवालों का रास्ता नहीं रोक सकते। लाठियां भीड़ को तितर-बितर कर सकती हैं, लेकिन असंतोष को समाप्त नहीं कर सकतीं। इतिहास गवाह है कि जब संवाद के दरवाज़े बंद होते हैं, तब आंदोलन सड़कों पर जन्म लेते हैं। सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि आने वाले दिनों में सरकार के भीतर भी कई स्तरों पर समीक्षा बैठकों का दौर शुरू हो सकता है। कौन-सा मंत्री दबाव में है, किस अधिकारी की कुर्सी हिल सकती है और किस राजनीतिक रणनीति में बदलाव होगा, इस पर फिलहाल कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है। लेकिन राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी तेज है कि यह केवल एक दिन की घटना नहीं, बल्कि आने वाले राजनीतिक संघर्ष की प्रस्तावना हो सकती है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत संसद है, सड़क नहीं। और सरकार की सबसे बड़ी ताकत पुलिस नहीं, जनता का विश्वास है। जिस दिन सत्ता यह अंतर भूल जाती है, उसी दिन इतिहास नई इबारत लिखना शुरू कर देता है।

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