मुख्यपृष्ठस्तंभअंदर की बात: मुंढे का डंडा, स्वीकृतों की लॉटरी और जयंत पाटील...

अंदर की बात: मुंढे का डंडा, स्वीकृतों की लॉटरी और जयंत पाटील की ‘निष्ठा’!

राजन पारकर

महाराष्ट्र की राजनीति और प्रशासन में इन दिनों तीन अलग-अलग घटनाएं दिखाई दे रही हैं, लेकिन इनके पीछे चल रही हलचल एक ही है। व्यवस्था पर पकड़ किसकी और राजनीतिक लाभ किसका? एक तरफ तुकाराम मुंढे ने आंगनवाड़ी और शालेय पोषण आहार की गुणवत्ता की ओर प्रशासन की नजर घुमाई है। दूसरी तरफ जिला परिषद और पंचायत समितियों में नामनिर्देशित सदस्यों की नियुक्ति का रास्ता खुलते ही राजनीतिक कार्यकर्ताओं की उम्मीदें जाग उठी हैं। और तीसरी तरफ जयंत पाटील ने दल-बदल की चर्चाओं के बीच ‘निष्ठा’ का ऐसा पाठ पढ़ाया कि सभा में हंसी भी फूटी और राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी भी शुरू हो गई। यानी कहीं आहार की गुणवत्ता की जांच है, कहीं कार्यकर्ताओं की ‘गुणवत्ता’ की परीक्षा और कहीं नेताओं की निष्ठा की!
हिसाब-किताब भी दिखना चाहिए!
तुकाराम मुंढे का नाम सुनते ही सरकारी गलियारों में फाइलें अपने आप सीधी खड़ी हो जाती हैं। ऐसी राजनीतिक चर्चा है। अब उनका रडार राज्य की आंगनवाड़ियों और शालेय पोषण आहार तक पहुंच गया है। सूत्रों के अनुसार, राज्यभर में आंगनवाड़ी, पोषण आहार और मिड-डे मील की गुणवत्ता की जांच के आदेश दिए गए हैं। सवाल केवल यह नहीं कि बच्चों की थाली में क्या परोसा जा रहा है; असली सवाल यह है कि बच्चों के नाम पर निकलने वाला सरकारी पैसा आखिर किसकी थाली में जा रहा है।
कार्यकर्ताओं की लॉटरी या राजनीतिक पुनर्वसन केंद्र?
जिला परिषद और पंचायत समितियों में मनोनीत सदस्यों की नियुक्ति का रास्ता खुलते ही राजनीतिक कार्यकर्ताओं के कान खड़े हो गए हैं। अधिसूचना आई नहीं कि राजनीतिक गलियारों में संभावित नामों की फुसफुसाहट शुरू। किसका नंबर लगेगा? किसका टिकट कटने के बाद यहां पुनर्वसन होगा? किस नाराज कार्यकर्ता को शांत किया जाएगा? महानगरपालिका और नगरपालिकाओं की तरह अर्ब ैंझ् और पंचायत समितियों में भी मनोनात सदस्य आने की चर्चा है। उपलब्ध खबर के अनुसार इससे कुल १,००५ नए सदस्यों के लिए राजनीतिक अवसर बन सकता है। अब लोकतंत्र का सवाल अलग है और राजनीति का गणित अलग! कागज पर उद्देश्य प्रतिनिधित्व बढ़ाना हो सकता है; लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा यह भी है कि कहीं यह नाराज कार्यकर्ताओं को ‘एडजस्ट’ करने का नया फॉर्मूला तो नहीं? क्योंकि चुनाव में टिकट मांगने वाले हर कार्यकर्ता को टिकट नहीं मिलता। टिकट नहीं मिला तो नाराजगी। नाराजगी बढ़ी तो बगावत। बगावत बढ़ी तो विपक्ष। और फिर सत्ता में बैठे लोग कहते हैं, ‘हमारे कार्यकर्ता हमारे परिवार जैसे हैं!’
दरवाजा बंद है या सिर्फ कुंडी लगी है?
पिछले कुछ दिनों से जयंत पाटील के भाजपा नेताओं से मुलाकातों को लेकर राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की चर्चा थी। राजनीति में दो नेता चाय पी लें तो भी लोग उसमें गठबंधन की चीनी खोजने लगते हैं! ऐसे माहौल में जयंत पाटील ने इस्लामपुर की सभा में निष्ठा का मुद्दा उठाया और साफ संकेत दिया कि पद मिले या न मिले, अपनों का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहने से व्यक्ति की ‘वैल्यू’ कम होती है और राजनीति में निष्ठा महत्वपूर्ण है। बात सुनने में बिल्कुल राजनीतिक संस्कारों की पाठशाला जैसी है। लेकिन राजनीति में असली परीक्षा भाषण की नहीं, समय आने पर लिए गए निर्णय की होती है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि यह भाषण केवल कार्यकर्ताओं के लिए संदेश था या उन लोगों के लिए भी, जो पिछले कुछ समय से जयंत पाटील के राजनीतिक भविष्य का अनुमान लगाने में व्यस्त हैं? सभा में हंसी फूटी, लेकिन सवाल गंभीर है कि क्या राजनीति में निष्ठा अब विचारधारा से तय होती है या अगले पद की संभावित कुर्सी से? जयंत पाटील ने फिलहाल दल-बदल की चर्चाओं पर विराम लगाने की कोशिश की है। लेकिन राजनीति में विराम और पूर्णविराम में जमीन-आसमान का अंतर होता है।

अन्य समाचार