राजन पारकर
मुंबई से अमदाबाद जा रही वंदे भारत एक्सप्रेस पर सूरत के उतरान स्टेशन के पास पत्थरबाजी की घटना ने रेलवे सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। खास बात यह है कि जिस ट्रेन पर पत्थर फेंके गए, उसमें उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल अपने परिवार के साथ यात्रा कर रही थीं। सौभाग्य से उन्हें कोई चोट नहीं आई। पुलिस ने एक युवक को गिरफ्तार किया है और शुरुआती जानकारी में उसके मानसिक रूप से अस्थिर होने की बात सामने आई है। लेकिन अंदर की बात यह है कि आरोपी मानसिक रूप से अस्थिर था, यह जांच का विषय हो सकता है; मगर रेलवे सुरक्षा व्यवस्था की परीक्षा तो हो ही गई! अगर एक तेज रफ्तार और हाई-प्रोफाइल ट्रेन पर पटरी किनारे से पत्थर आसानी से फेंका जा सकता है तो सवाल सिर्फ आरोपी का नहीं है। रेलवे की निगरानी व्यवस्था कहां थी? राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इस घटना को केवल ‘शरारती युवक’ की कहानी बनाकर बंद करना आसान है। मगर जनता पूछ रही है कि कल किसी पत्थर की जगह कोई बड़ा खतरा सामने आया तो जिम्मेदारी किसकी होगी। पत्थर एक युवक ने फेंका होगा; लेकिन सुरक्षा में छेद किसने छोड़ा, यह सवाल अभी बाकी है!
पत्थर ट्रेन पर पड़े, बीमारी व्यवस्था में है और पेपर लीक ने भरोसे की पटरी उतार दी!
महाराष्ट्र से गुजरात तक तीन अलग-अलग घटनाएं सामने आर्इं; लेकिन तीनों के पीछे एक ही सवाल खड़ा है कि व्यवस्था आखिर कब जागेगी? एक तरफ राज्यपाल की मौजूदगी वाली वंदे भारत पर पत्थर बरसते हैं, दूसरी तरफ पालघर की आश्रमशाला में बच्चे बीमार पड़ते हैं और तीसरी तरफ एमपीएससी की परीक्षा का पेपर लीक होने के बाद पूरी भर्ती प्रक्रिया रद्द करनी पड़ती है। घटनाएं अलग हैं, विभाग अलग हैं, लेकिन जनता के मन में पैदा हुआ सवाल एक है कि सुरक्षा, प्रशासन और परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा करें तो करें वैâसे। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि सरकारें घोषणाओं में जितनी तेज दौड़ती हैं, उतनी वे जवाबदेही के मामले में तत्परता क्यों नहीं दिखातीं। सूत्रों के अनुसार, ऐसी घटनाएं केवल तत्काल कार्रवाई से नहीं मिटतीं; इनके पीछे की प्रशासनिक चूक और जिम्मेदारी भी तय करनी पड़ती है। वरना हर घटना के बाद आरोपी पकड़ा जाएगा, जांच बैठेगी और फिर फाइल किसी ठंडे कपाट में चली जाएगी!
प्रशासन को जागने के लिए मौत की खबर क्यों चाहिए?
पालघर के मासवण स्थित अनुदानित आश्रमशाला में छह वर्षीय विद्यार्थी की मौत के बाद प्रशासन सक्रिय हुआ और स्वास्थ्य जांच में ३५ विद्यार्थियों में बुखार जैसे लक्षण पाए गए। इनमें ३० विद्यार्थियों का उपचार मासवण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में तथा पांच विद्यार्थियों का उपचार मनोर ग्रामीण अस्पताल में चल रहा है। अब अधिकारी बच्चों की तबीयत पर नजर रख रहे हैं। अच्छी बात है, लेकिन सवाल यह है कि नजर पहले क्यों नहीं थी? आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों की आश्रमशालाएं केवल सरकारी फाइलों में मौजूद इमारतें नहीं हैं; वहां राज्य का भविष्य पढ़ता है। वहां रहने वाले बच्चों की स्वास्थ्य व्यवस्था, भोजन, पानी, स्वच्छता और नियमित चिकित्सा जांच सरकार की जिम्मेदारी है। सूत्रों के अनुसार, ऐसी घटनाओं में अक्सर जांच का पहिया चलता है, रिपोर्ट बनती है और जिम्मेदारी तय करने की भाषा शुरू होती है। लेकिन अंदर की बात यह है कि जिम्मेदारी केवल कागज पर तय हुई तो बीमारी व्यवस्था की रहेगी और फाइल सरकार की! एक बच्चे की मौत के बाद ३५ बच्चे बीमार मिलना कोई सामान्य प्रशासनिक फुटनोट नहीं हो सकता। यह सवाल पूछता है कि स्वास्थ्य विभाग और आश्रमशाला प्रशासन की निगरानी व्यवस्था आखिर कितनी सक्रिय थी? सरकार को यह तय करना होगा कि आश्रमशाला के बच्चे ‘दूर के गांवों के आंकड़े’ नहीं, बल्कि राज्य के नागरिक हैं।
एमपीएससी ने भर्ती रद्द की, लेकिन युवाओं के भरोसे का क्या?
एमपीएससी ने औषध निरीक्षक, गट-ब पद के लिए मार्च २०२६ में हुई परीक्षा की पूरी भर्ती प्रक्रिया रद्द करने का निर्णय लिया है। मुंबई पुलिस की अपराध शाखा की जांच के बाद २२ मार्च को हुई परीक्षा का पेपर २० मार्च को लीक होने का प्राथमिक निष्कर्ष सामने आया। अब आयोग फिर से परीक्षा लेने की तैयारी में है और पात्र उम्मीदवारों को दोबारा आवेदन अथवा परीक्षा शुल्क भरना ही पड़ेगा। इस मामले में रोहित पवार ने पहले ही पेपर लीक को लेकर सवाल उठाए थे और प्रस्तुतीकरण के माध्यम से कथित पेपर लीक का मुद्दा उठाया था। अब सवाल यह नहीं कि रोहित पवार सही निकले या सरकार गलत साबित हुई। सवाल यह है कि हजारों युवाओं का क्या? जिस युवक ने महीनों पढ़ाई की, पैसा खर्च किया, नौकरी का सपना देखा और परीक्षा दी, उससे कोई यह वैâसे कहे कि ‘फिर से परीक्षा दे दो’। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता अब सरकारों के लिए सबसे बड़ा प्रशासनिक इम्तिहान बन चुकी है। एक पेपर लीक होता है तो सिर्फ प्रश्नपत्र बाहर नहीं जाता, पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता बाहर चली जाती है! एमपीएससी ने परीक्षा रद्द करके सही कदम उठाया है; मगर असली परीक्षा अब शुरू होती है कि पेपर लीक हुआ वैâसे? किसने उपलब्ध कराया? किसने खरीदा? किसने बेचा? और उस पूरी शृंखला में कौन-कौन था? यदि जांच केवल छोटे प्यादे तक पहुंचीr और असली खिलाड़ी बच गए तो अगली परीक्षा फिर केवल विद्यार्थियों की नहीं, सरकार की भी होगी। वंदे भारत पर पत्थरबाजी हो, आश्रमशाला में बच्चों की तबीयत बिगड़े या एमपीएससी का पेपर लीक हो, हर घटना के बाद सरकार का पहला काम बयान देना नहीं, व्यवस्था की जवाबदेही तय करना होना चाहिए। पत्थरबाज गिरफ्तार हो जाएगा, बीमार बच्चों का इलाज हो जाएगा, पेपर की फिर से परीक्षा भी हो जाएगी; लेकिन जनता के मन में जो भरोसा बीमार पड़ा है, उसका इलाज कौन करेगा? सूत्रों के अनुसार, सत्ता के गलियारों में हमेशा यही सवाल घूमता रहता है कि किसकी कुर्सी हिलेगी। किस अधिकारी से जवाब मांगा जाएगा? किस विभाग पर ठीकरा फोड़ा जाएगा? मगर जनता का सवाल इससे बड़ा है। ‘कुर्सी किसी की भी हिले, व्यवस्था क्यों नहीं सुधरती?’ यही है आज की अंदर की बात!
