राजन पारकर
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति उज्जल भुईयां की टिप्पणी केवल न्यायालय की टिप्पणी नहीं, बल्कि लोकतंत्र के आईने पर पड़ा एक सवाल है। यदि शांतिपूर्ण विरोध करने वाले छात्र महीनों जेल में रहें, जमानत भी शर्तों की बेड़ियों में बंधी मिले और असहमति को ही संदेह की निगाह से देखा जाए, तो लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव तक सीमित रह जाता है। सवाल सरकार का नहीं, व्यवस्था का है। आज जो सत्ता में हैं, कल विपक्ष में भी हो सकते हैं। इसलिए विरोध की आवाज को कुचलने की परंपरा किसी एक दल के नहीं, पूरे लोकतंत्र के खिलाफ जाती है। चर्चा है कि न्यायपालिका की ऐसी टिप्पणियों ने सत्ता के भीतर भी बेचैनी बढ़ाई है। क्योंकि अदालतें जब लोकतंत्र की भाषा बोलने लगती हैं, तब राजनीतिक गलियारों में सन्नाटा भी बहुत कुछ कह देता है।
अब सत्ता सुनेगी या फिर शोर बढ़ेगा?
देश की राजनीति इन दिनों तीन तस्वीरों के बीच झूल रही है। एक तरफ सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश लोकतंत्र में असहमति के सिकुड़ते दायरे पर चिंता जता रहे हैं। दूसरी ओर छात्रों के आंदोलन के बाद शिक्षा मंत्री का इस्तीफा राष्ट्रीय बहस का विषय बना हुआ है। उधर महाराष्ट्र में सरकार ‘लाडकी बहिण’ योजना को लेकर महिलाओं की नाराजगी शांत करने में जुटी दिखाई दे रही है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि सरकारें अब केवल चुनाव नहीं, जनभावनाओं का तापमान भी नापने लगी हैं। सूत्रों के अनुसार सत्ता के भीतर भी यह चर्चा है कि जनता की नाराजगी को केवल विज्ञापनों से नहीं, पैâसलों से शांत करना होगा।
आंदोलन का चेहरा अस्पताल में!
आंदोलन खत्म हुआ, मंत्री बदले, मंच खाली हो गया। लेकिन अस्पताल के बिस्तर पर लेटा एक छात्र नेता सत्ता से बड़ा सवाल पूछ रहा है। किसी आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत उसके पोस्टर नहीं बल्कि वे लोग होते हैं, जो अपनी सेहत, पढ़ाई और भविष्य दांव पर लगा देते हैं। तस्वीर में सलाइन लगी है, लेकिन संदेश सत्ता की नसों तक पहुंच चुका है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि छात्र आंदोलन ने आने वाले समय की राजनीति का नया समीकरण लिख दिया है। अब केवल भाषणों से नहीं, जवाबदेही से भी सरकारों का मूल्यांकन होगा।
बहनों को राहत या चुनावी मरहम?
लाडली बहन योजना में ई-केवाईसी की समयसीमा बढ़ाने का निर्णय लाखों महिलाओं के लिए राहत लेकर आया है। सरकार का कहना है कि किसी पात्र महिला का लाभ छूटना नहीं चाहिए, लेकिन राजनीति में हर राहत के पीछे सवाल भी चलते हैं। सूत्रों के अनुसार सत्ता पक्ष का आकलन है कि जनकल्याणकारी योजनाओं में तकनीकी अड़चनें यदि समय रहते दूर नहीं की गर्इं, तो उसका राजनीतिक असर भी दिखाई दे सकता है। महिलाओं को राहत मिलना स्वागतयोग्य है, लेकिन ऐसी योजनाएं केवल चुनावी मौसम की नहीं, सुशासन की पहचान बनें, यही लोकतंत्र की अपेक्षा है। एक ओर अदालत लोकतंत्र में असहमति की रक्षा की बात कर रही है। दूसरी ओर छात्र आंदोलन ने यह दिखाया कि संगठित जनदबाव राजनीति की दिशा बदल सकता है। वहीं सरकारें भी समझ चुकी हैं कि जनता की नाराज़गी को समय रहते संबोधित करना ही सबसे बड़ी राजनीतिक रणनीति है। लोकतंत्र केवल सत्ता का अधिकार नहीं, जनता का विश्वास भी है। और जब जनता सवाल पूछने लगे, अदालतें चिंता जताने लगें और सरकारें पैâसले बदलने लगें, तब समझ लीजिए कि लोकतंत्र अभी जिंदा है, लेकिन उसे लगातार संभालने की जरूरत है।
