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पड़ताल : मीठी नदी की सुरक्षा दीवार में दरार! …. खतरे के कगार पर कपाड़िया नगर

धीरेंद्र उपाध्याय
मुंबई की मीठी नदी, जो कभी शहर की जीवनरेखा हुआ करती थी, आज कुर्ला-पश्चिम के निवासियों के लिए डर का सबब बन गई है। विशेष रूप से कपाड़िया नगर के इलाके में नदी के किनारे बनी सुरक्षा दीवार (रिटेनिंग वॉल) अपनी अंतिम सांसे ले रही है। यह महज एक दीवार नहीं है, बल्कि कपाड़िया नगर की बिल्डिंग नंबर १३ से १६ के बीच रहनेवाले ११२ परिवारों के लिए सुरक्षा की एकमात्र ढाल है। वर्तमान में इस ढाल में इतने छेद हो चुके हैं कि मानसून की पहली आहट ही यहां के निवासियों की रातों की नींद उड़ाने के लिए काफी है।
हैरानी की बात यह है कि साल २०१२ में जब एमएमआरडीए ने इस दीवार का निर्माण किया था, तब इसे मानसून की बाढ़ और नदी के कटाव को रोकने के लिए एक ठोस समाधान माना गया था। लेकिन रखरखाव की जिम्मेदारी जब बीएमसी के कंधों पर आई तो विभागीय तालमेल की कमी और लापरवाही ने इसे जर्जर होने के लिए छोड़ दिया। आज स्थिति यह है कि कंक्रीट पूरी तरह झड़ चुका है और दीवार के भीतर की पसलियों की तरह लोहे के जंग लगे सरिए बाहर झांक रहे हैं। स्थानीय निवासी बताते हैं कि पिछले दो सालों में दीवार का क्षरण बहुत तेजी से हुआ है, जिससे इसकी नींव पूरी तरह खोखली हो गई है।
इस खतरे को और अधिक गंभीर बना रहे हैं। मुंबई के बड़े इंप्रâास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स। कपाड़िया नगर के ठीक आस-पास मेट्रो लाइन २बी और मुंबई-अमदाबाद बुलेट ट्रेन जैसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स का काम जोरों पर है। इन निर्माण कार्यों में इस्तेमाल होनेवाली भारी-भरकम मशीनों और उनकी खुदाई से उत्पन्न होनेवाले कंपन ने इस कमजोर दीवार की जड़ों पर प्रहार किया है। विकास की इस दौड़ में उन सैकड़ों परिवारों की सुरक्षा हाशिए पर चली गई है, जो इस दीवार के ठीक बगल में अपनी जिंदगी बसर कर रहे हैं। कंपन के कारण दीवार की दरारें चौड़ी होती जा रही हैं और अब यह किसी भी क्षण ढहने की स्थिति में पहुंच गई है।
पिछला मानसून यहां के लोगों के लिए एक चेतावनी की तरह था। नदी का जलस्तर बढ़ते ही पानी की तेज धार दीवार की झिर्रियों से रिसकर कॉलोनी के अंदर घुसने लगी थी। स्थानीय निवासियों के मन में २००५ की प्रलयंकारी बाढ़ की यादें आज भी ताजा हैं और उन्हें डर है कि अगर यह दीवार मानसून के दौरान ढह गई तो इतिहास खुद को दोहरा सकता है। पानी के दबाव और नदी के तेज बहाव को झेलने की शक्ति अब इस दीवार में नहीं बची है।
हालांकि, प्रशासन की ओर से अब मरम्मत के आश्वासन दिए जा रहे हैं और अधिकारियों ने मौके का मुआयना भी किया है, लेकिन जमीनी हकीकत अब भी वही है। मानसून आने में अब गिनती के दिन बचे हैं। केवल कागजी आश्वासन और अस्थायी पैबंद इस समस्या का समाधान नहीं हो सकते। यदि समय रहते इस दीवार को मजबूती नहीं दी गई तो यह न केवल एक रिहायशी इलाके को जलमग्न कर देगी, बल्कि पास से गुजरने वाले करोड़ों के मेट्रो और बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट्स के लिए भी बड़ा संकट पैदा कर सकती है। यह देखना बाकी है कि प्रशासन इस ‘डरावनी सच्चाई’ पर कब जागता है और कब कपाड़िया नगर के लोगों को इस निरंतर भय से मुक्ति मिलती है।

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