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पड़ताल : हिंदुस्थान के ‘सफेद हाथी’ … करोड़ों के निवेश के बावजूद सूने हैं हवाई अड्डे

टेलीविजन इंडस्ट्री से जुड़े आजमगढ़ के अशोक सिंह का उस दिन खुशी का ठिकाना नहीं था, जिस दिन उन्हें पता चला कि आजमगढ़ हवाई अड्डे से उड़ानें शुरू हो चुकी हैं। बात मार्च २०२४ की है। साल के अंत होते-होते उन्हें पता चला कि आजमगढ़ से उड़ानें बंद हो चुकी हैं। क्या बात सिर्फ आजमगढ़ हवाई अड्डे की नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के सात हवाई अड्डों की है।
उत्तर प्रदेश में २०२१ के बाद शुरू हुए नए एयरपोर्ट्स को लेकर Rऊघ् से जो खुलासा हुआ है, वह चौंकाने वाला है। एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAघ्) के कुशीनगर डिविजन से मिले जवाब के मुताबिक, २०२१ के बाद सात एयरपोर्ट्स से कमर्शियल फ्लाइट्स शुरू हुईं, लेकिन इनमें से छह पर अब नियमित उड़ानें बंद हो चुकी हैं। इन सात में से फिलहाल सिर्फ अयोध्या एयरपोर्ट पर ही शेड्यूल्ड फ्लाइट्स चल रही हैं। मामला सिर्फ उत्तर प्रदेश का ही नहीं है, बल्कि हिंदुस्थान में इस तरह से एक्टिव पड़े हवाई अड्डों की फेहरिस्त लंबी है। सच तो यह है कि हिंदुस्थान में नागरिक उड्डयन क्षेत्र का विस्तार तेजी से हो रहा है, लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक कड़वी हकीकत भी छिपी है। देश के लगभग ९३ हवाई अड्डों में से २० हवाई अड्डे वर्तमान में निष्क्रिय (नॉन-ऑपरेशनल) पड़े हैं। क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई योजनाएं अब सरकारी खजाने पर बोझ बन रही हैं।
निवेश और रखरखाव का भारी बोझ
हवाई अड्डों का निर्माण और रखरखाव एक खर्चीला सौदा है। आंकड़ों के अनुसार:
कुशीनगर हवाई अड्डा: रु३२७ करोड़ की लागत से बना यह अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा नवंबर २०२३ से वीरान है। इसके रखरखाव पर सालाना रु ५ करोड़ खर्च हो रहे हैं। पाक्योंग (सिक्किम): रु६०५ करोड़ की लागत वाला यह रणनीतिक हवाई अड्डा जून २०२४ से परिचालन में नहीं है। रखरखाव खर्च: अकेले २० निष्क्रिय हवाई अड्डों के बिजली, स्टाफ और सुरक्षा पर सालाना लगभग रु९० करोड़ खर्च किए जा रहे हैं।
विफलता की अहम वजहें
इन हवाई अड्डों के `सफेद हाथी’ बनने के पीछे कई तकनीकी और आर्थिक कारण हैं:
यात्रियों की भारी कमी: छोटे शहरों में मांग का सही आकलन किए बिना बुनियादी ढांचा तैयार कर दिया गया, जिससे विमानन कंपनियों को मुनाफा नहीं मिल रहा।
परिचालन संबंधी बाधाएं: पाक्योंग जैसे हवाई अड्डों पर खराब मौसम और तकनीकी दिक्कतें बड़ी रुकावट हैं। वहीं कई जगह रनवे की खराब स्थिति और टर्मिनल सुविधाओं का अभाव है।
एयरलाइंस की समस्या: विमानों की कमी और वित्तीय घाटे के कारण स्पाइसजेट जैसी कंपनियों ने कई छोटे रूटों से अपनी सेवाएं वापस ले ली हैं।
आर्थिक और सामाजिक प्रभाव
हवाई अड्डों के बंद होने से केवल पैसा ही बर्बाद नहीं हो रहा, बल्कि स्थानीय विकास भी बाधित हो रहा है। उड़ान (ळDAर्‍) योजना के तहत रु १.५ लाख करोड़ का निवेश किया गया, लेकिन जैसलमेर, आजमगढ़ और तेजपुर जैसे हवाई अड्डों पर व्यावसायिक उड़ानें न होने से पर्यटन और व्यापार को अपेक्षित गति नहीं मिल सकी। इसके अलावा, देश के विभिन्न हवाई अड्डों पर १६४ विमान निष्क्रिय खड़े हैं, जो उड्डयन क्षेत्र के संकट को और गहराते हैं।

देश में कई हवाई अड्डे निष्क्रिय पड़े हुए हैं,
जिनमें से कुछ प्रमुख हैं:
आजमगढ़ हवाई अड्डा: उड़ान योजना के तहत निवेश के बावजूद उड़ानें शुरू नहीं हो सकीं।
जैसलमेर हवाई अड्डा: व्यावसायिक उड़ानें कभी शुरू ही नहीं हुईं।
तेजपुर हवाई अड्डा: व्यावसायिक उड़ानें कभी शुरू ही नहीं हुईं।
अलीगढ़ हवाई अड्डा: पिछले दो वर्षों में बंद कर दिया गया।
मुरादाबाद हवाई अड्डा: पिछले दो वर्षों में बंद कर दिया गया।
चित्रकूट हवाई अड्डा: पिछले दो वर्षों में बंद कर दिया गया।
श्रावस्ती हवाई अड्डा: पिछले दो वर्षों में बंद कर दिया गया।
गुजरात, पंजाब, मध्य प्रदेश और सिक्किम के कुछ हवाई अड्डे: उड़ान योजना के तहत निवेश के बावजूद उनका इस्तेमाल नहीं हो सका।

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