-लोकल में घुट रहा यात्रियों का दम
-भायंदर से बांद्रा तक सफर में यात्री हलकान
– झगड़े, गालियां और धक्का-मुक्की रोज की बात
जेदवी
मुंबई की धड़कन कही जानेवाली लोकल ट्रेनें अब आम आदमी के लिए डर का दूसरा नाम बन चुकी हैं। सुबह और शाम के समय पीक ऑवर्स में भायंदर से बांद्रा तक का सफर यात्रियों के लिए किसी जंग से कम नहीं है।
भीड़ का तांडव
मालाड, कांदिवली, बोरीवली और दहिसर स्टेशनों पर सुबह और शाम का नजारा भयावह है। लोग ट्रेन में चढ़ने के लिए धक्का-मुक्की करने के साथ ही गिरने, झगड़ने और चोरी जैसी घटनाओं से दो-चार होते हैं। यात्रियों का कहना है कि ‘विरार ट्रेन में चढ़ना अब जिगर का काम है, अगर चढ़ गए तो उतरना बेहद मुश्किल है।’ भायंदर से बांद्रा तक हर लोकल ट्रेन अब दमघोंटू कैदखाना बन गई है। पीक ऑवर में अगर कोई यात्री गलती से विरार ट्रेन में चढ़ गया तो मीरा रोड से पहले उतरना असंभव है।
लोकल में सुरक्षा नदारद
आरपीएफ और जीआरपी की मौजूदगी कागजों तक सीमित है। जो जवान दिखते हैं, वे प्लेटफॉर्म के कोनों में मोबाइल स्क्रॉल करते नजर आते हैं। रात में लेडीज डिब्बों में गश्त नाममात्र के लिए है। सीसीटीवी वैâमरे लगे जरूर हैं, लेकिन वो नाकाफी हैं और अधिकतर कैमरे बंद पड़े हैं।
महिलाओं की शिकायत
झगड़े, गालियां और धक्का-मुक्की रोजाना की बात है। ट्रेनें लेट, सुरक्षा गायब और शिकायत सुनने वाला कोई नहीं। फुटओवर ब्रिज पर सामान विक्रेताओं की वजह से न केवल जाम लगता है, बल्कि सफाई का हाल बेहाल है। रेलवे अधिकारी और ठेकेदार फोटो सेशन में व्यस्त रहते हैं, जबकि यात्रियों की परेशानियां दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही हैं।
हर साल सैकड़ों मौतें
पश्चिम उपनगर पर हर साल सैकड़ों यात्री गिरने या फिसलने से मरते हैं। सूत्रों के मुताबिक २०२४-२५ में १,२०० से ज्यादा मौतें दर्ज हुर्इं, लेकिन विभाग ने आधिकारिक रिपोर्ट में सिर्फ ७०० मौतें दिखाई गई हैं।
जनता का सवाल
अगर लोकल मुंबई की जीवनरेखा है, तो क्या सरकार और रेलवे अब उसका पोस्टमार्टम करने पर तुली है? यात्रियों की मांग हैं कि पीक ऑवर्स में अतिरिक्त ट्रेनें चलाने के साथ ही सुरक्षा गश्त बढ़ाई जाए और स्टेशनों के बुनियादी ढांचे में सुधार लाया जाए। वरना मुंबई की यह ‘लाइफलाइन’ जल्द ही ‘मौत की रेल’ बन जाएगी, जहां हर दिन का सफर मौत को न्योता देने जैसा है।
इन्हीं सब समस्याओं पर बात करते हुए वेस्टर्न रेलवे जनसंपर्क अधिकारी स्मिता रोसारियो ने बताया कि एक दिन में १० महिला स्पेशल ट्रेन चलती हैं। ट्रेन की संख्या बढ़ाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि हर ३ मिनट में एक ट्रेन है। ऐसे में ट्रेन की संख्या बढ़ाना कठिन है। ट्रेन में बढ़ती घटनाओं के मद्देनजर सुरक्षा बढ़ाई गई है। खासकर रात के समय गश्त और ट्रेन के डिब्बों में अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था की जा रही है। फिलहाल, अतिरिक्त ट्रेन चलाने की कोई जानकारी नहीं है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या रेलवे यात्रियों के इस घुटनभरे सफर को राहत में बदल पाएगा या मुंबईकरों की सांसें यूं ही भीड़ में घुटती रहेंगी?
भीड़ में थम जाती हैं सांसें
– मालाड की यात्री रेणुका पाटील ने ‘सामना संवाददाता’ से बात करते हुए कहा कि ‘मैं अंधेरी से विरार लोकल में चढ़ी थी। भीड़ इतनी थी कि मालाड में उतरना नामुमकिन था। जोगेश्वरी से बोरीवली तक बस भीड़ का दबाव झेलती चली गई। बोरीवली उतरते के बाद ऐसा लगा जैसे मौत के मुंह से मैं वापस आई हूं। मैं ठीक से सांस तक नहीं ले पा रही थी।’
– कांदिवली निवासी मेघना पांडे (३२) ने बताया कि ‘शाम ७:३० का समय था और मुझे दहिसर उतरना था, लेकिन भीड़ के धक्के से मैं प्लेटफॉर्म पर गिर गई। कमर और एड़ी में चोट लगी, जिसका इलाज अभी तक चल रहा है। मगर मजबूरी है कि रोजाना सफर करना पड़ता है।’
