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तहकीकात: हकीकत फांसी की

-बिल्ला कांपता रहा, रंगा नारा लगाता रहा

फिरोज खान

बिल्ला और रंगा को अदालत ने फांसी की सजा सुनाई जिसे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा। राष्ट्रपति ने उनकी दया की याचिका अस्वीकार कर दी। फांसी से एक हफ्ते पहले इन्हें जेल नंबर ३ की फांसी कोठी में ले जाया गया। वहां उन्हें पूरी तरह से एकांतवास में रखा गया और वो २४ घंटे तमिलनाडु स्पेशल पुलिस के जवानों की निगरानी में रहे। दोनों को फांसी देने के लिए फरीदकोट से फकीरा और मेरठ से कालू जल्लाद को बुलाया गया। कालू और फकीरा दोनों फांसी देने में माहिर थे। एक प्रथा के मुताबिक, फांसी से पहले उनको ‘ओल्ड मंक’ शराब पीने के लिए दी गई थी, क्योंकि माना जाता था कि कोई भी व्यक्ति चाहे वो जल्लाद ही क्यों न हो अपने होशो हवास में किसी की जान नहीं ले सकता। जेल मैनुअल में किसी की जान लेने के लिए जल्लाद को सिर्फ १५० रुपए देने का जिक्र है जो कि बहुत कम है। दोनों को फांसी देने के लिए बिहार की बक्सर जेल से रस्सी मंगाई गई। असल में ये रस्सी बाजार से खरीदी नहीं जाती बल्कि बिहार की बक्सर जेल में खासतौर से बनाई जाती है। इसको लचीला बनाने के लिए इस पर मोम या मक्खन का लेप किया जाता है। कुछ जल्लाद इसके लिए पके हुए केले को मसलकर रस्सी पर लगाते हैं। इस रस्सी की लंबाई १.८ मीटर से २.४ मीटर के बीच होती है। इनमें से एक जल्लाद फकीरा बिल्कुल काला था। वो अपने आप को यमराज के रूप में दिखाने की कोशिश करता था। कालू की तोंद बाहर निकली हुई थी जैसी कि आमतौर से हलवाइयों की होती है। दोनों जानबूझकर भयानक दिखने की कोशिश करते थे। फांसी से एक दिन पहले दिल्ली के पांच पत्रकारों ने रंगा और बिल्ला से मिलने की इच्छा प्रकट की। रंगा ने तो उनसे मिलने से इंकार कर दिया लेकिन बिल्ला करीब २० मिनट तक मिला। जब वो उनसे बातें कर रहा था तो उसका पूरा शरीर कांप रहा था। वो आखिरी तक कहता रहा कि रब जानता है कि उसने ये अपराध नहीं किया है और उसे फंसाया गया है। लेकिन उसकी बॉडी लैंग्वेज से देख सकते थे कि वो झूठ बोल रहा है। फांसी की रात रंगा ने अपना खाना खाया और सामान्य ढंग से सोया। बिल्ला ने न तो खाना खाया और न ही वो एक मिनट के लिए भी सोया। वो पूरी रात अपनी कोठरी के चक्कर लगाते हुए बड़बड़ाता रहा। जेल कर्मचारियों ने उन्हें ५ बजे जगाकर कहा कि नहा लो। रंगा तो नहाया था लेकिन बिल्ला ने नहाने से मना कर दिया। फांसी से पहले दोनों के चेहरे काले कपड़े की एक तरह की थैली से ढके गए ताकि वो देख न सकें कि बाहर क्या हो रहा है। फांसी के समय बिल्ला सिसक रहा था जबकि रंगा अखिर तक बहुत जोश में था, फांसी से पहले उसने जोर से नारा लगाया, ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’। फांसी से कुछ सेकंड पहले नोट किया कि दोनों के चेहरों के रंग बदल गए है। ऐसा लगा जैसे डर से उनका चेहरा काला पड़ गया हो। निर्धारित समय पर जेल के सुपरिंटेंडेंट ने लाल रुमाल हिलाया और कालू ने फकीरा की मदद से लीवर खींच दिया। बाद में कई सालों तक सुपरिंटेंडेंट अपने दोस्तों को वो लाल रुमाल दिखाते रहे, जिससे उन्होंने बिल्ला और रंगा को फांसी दिए जाने का आदेश दिया था। दो घंटे बाद जब डाक्टरों ने उनकी जांच की तो बिल्ला तो मृत पाया गया लेकिन रंगा की नाड़ी अभी तक चल रही थी। फांसी निर्भर करती है अपराधी के वजन पर, बताया गया कि चूंकि वो लंबा था और उसने फांसी के समय अपनी सांस रोक ली थी, इसलिए उसकी जान तुरंत नहीं निकली। तब जेल के एक कर्मचारी को कुएं में उतारा गया। उसने उसके पैर खींचे, तब जाकर उसके प्राण पखेरू उड़े।

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