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इस्लाम की बात : बांग्लादेश में हिंसा… पाकिस्तान की साजिश और भारतीय मुसलमान

सैयद सलमान, मुंबई

बांग्लादेश में हालिया समय में उभरी अशांति, अराजकता और अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय पर हमलों की खबरें केवल आंतरिक असंतोष का परिणाम हैं या इसके पीछे किसी बाहरी शक्ति की भूमिका भी है, यह सवाल आज दक्षिण एशिया की राजनीति के केंद्र में है। घटनाओं की शृंखला, उसका समय और उसका स्वरूप कई गंभीर सवाल खड़े करता है। क्योंकि यह सब स्वत:स्फूर्त नहीं लगता। इसके पीछे जरूर किसी संगठित साजिश की भूमिका है। और यदि है, तो स्पष्ट है कि पाकिस्तान एक बार फिर दक्षिण एशिया में अस्थिरता पैâलाने की पुरानी रणनीति पर काम कर रहा है।
नैतिक जिम्मेदारी
बांग्लादेश का निर्माण धर्मनिरपेक्ष मूल्यों, भाषा और सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा के लिए हुआ था। १९७१ के मुक्ति संग्राम में भारत ने निर्णायक भूमिका निभाई थी। तब से दोनों देशों के रिश्ते साझा इतिहास और सहयोग पर टिके रहे हैं। यूं भी बांग्लादेश और पाकिस्तान भारत का ही अंश रहे हैं। इसके बावजूद यदि आज बांग्लादेश की सड़कों पर हिंदुओं को निशाना बनाया जा रहा है, मंदिरों पर हमले हो रहे हैं और भारत के खिलाफ नफरत को हवा दी जा रही है, तो इसे सिर्फ कानून व्यवस्था की विफलता नहीं कहा जा सकता। इससे शासन की नैतिक जिम्मेदारी पर भी सवाल उठता है। धर्म, जाति या राजनीतिक झुकाव से परे किसी भी संप्रभु सरकार का पहला दायित्व अपने सभी नागरिकों की सुरक्षा है।
भारत-विरोधी नारों और सोशल मीडिया पर पैâलाए जा रहे जहर को देखें तो यह भीड़ की भावनात्मक प्रतिक्रिया से कहीं आगे की चीज लगती है। यहां पाकिस्तान की भूमिका पर संदेह इसलिए होता है, क्योंकि उसका अतीत ऐसे ही प्रयोगों से भरा पड़ा है। कश्मीर में आतंकवाद को हवा देना, अफगानिस्तान में प्रॉक्सी गुटों का इस्तेमाल करना और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ दुष्प्रचार करना, यह उसकी स्थापित कार्यशैली रही है। बांग्लादेश में कट्टरपंथी समूहों का उभार और उनका भारत-विरोधी रुख उसी रणनीति की अगली कड़ी जैसा प्रतीत होता है, जिसका मकसद भारत के सीमावर्ती इलाकों में अस्थिरता पैदा करना है।
जहां तक मुस्लिम दृष्टिकोण का सवाल है, तो यह बात स्पष्ट है कि निर्दोष लोगों पर हिंसा इस्लाम की शिक्षाओं के खिलाफ है। कुरआन कहता है, ‘जिसने एक निर्दोष इंसान की हत्या की, उसने पूरी मानवता की हत्या की’ (अल-कुरआन- ५:३२)। यह आयत किसी एक समुदाय के लिए नहीं है। यह आयत पूरे मानव समाज के लिए नैतिक दिशा तय करती है। इस्लाम न्याय, सह-अस्तित्व और शांति का संदेश देता है। पैगंबर मोहम्मद साहब ने मदीना में जो पहला सामाजिक समझौता किया, उसमें गैर-मुस्लिमों को बराबरी का नागरिक अधिकार दिया गया। इसलिए आज किसी इस्लामी मुल्क में यदि इस्लाम के नाम पर हिंदुओं को डराया जा रहा है या मारा जा रहा है, तो वह इस्लाम नहीं, बल्कि धर्म का राजनीतिक दुरुपयोग है।
दोहरी चुनौती
पाकिस्तान लंबे समय से खुद को इस्लाम का ठेकेदार समझता रहा है, लेकिन उसकी नीतियों ने मुसलमानों को भी केवल हिंसा और अस्थिरता दी है। बांग्लादेश में धार्मिक भावनाओं को भड़काकर वह भारत-विरोधी माहौल बनाना चाहता है और यहां की सामाजिक एकता को भी तोड़ना चाहता है। यह रणनीति अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए होती है, लेकिन दीर्घकाल में पूरे क्षेत्र को नुकसान पहुंचाती है।
भारत के सामने चुनौती दोहरी है। एक ओर राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमावर्ती स्थिरता का सवाल है, दूसरी ओर नैतिक और कूटनीतिक संतुलन का। भारत को बांग्लादेश की वर्तमान सरकार के सामने स्पष्ट शब्दों में यह संदेश देना चाहिए कि वह अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे और नफरत पैâलाने वालों पर सख्त कार्रवाई करे। यह किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं, बल्कि पड़ोसी और मित्र राष्ट्र के रूप में एक जायज अपेक्षा है। साथ ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तथ्यपरक ढंग से यह बात रखना भी जरूरी है कि भारत-विरोधी हिंसा और दुष्प्रचार क्षेत्रीय शांति के लिए खतरा है। यही भारतीय मुसलमानों की भी भूमिका होनी चाहिए। भारतीय मुसलमानों का यह कहना भी जरूरी है कि भारत का पक्ष केवल राष्ट्रीय हित के साथ ही इंसाफ और बहुलता का पक्ष है। भारत की पहचान उसकी विविधता में एकता से बनी है। यहां मुसलमानों ने सदियों से इस देश की संस्कृति, भाषा और लोकतंत्र को समृद्ध किया है। इसलिए जब कहीं भी धर्म के नाम पर हिंसा होती है, तो उसका विरोध करना मुस्लिम समाज की नैतिक जिम्मेदारी है। बांग्लादेश की शांति भारत के हित में है और भारत की स्थिरता बांग्लादेश के हित में। दोनों देशों के आम लोग रोजगार, शिक्षा और सम्मान चाहते हैं। नफरत और भय का माहौल उन्हें नहीं चाहिए। ऐसे में क्षेत्र के जिम्मेदार देश मिलकर कट्टरपंथ, दुष्प्रचार और राजनीतिक हिंसा का मुकाबला करेंगे, तभी पाकिस्तान की साजिशें नाकाम होंगी। इस्लाम का असल संदेश अमन और इंसाफ है। भारत का भी पक्ष इंसाफ, बहुलता और मानवता का पक्ष है और यही पक्ष अंतत: जीतना चाहिए।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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