मुख्यपृष्ठस्तंभइस्लाम की बात : एकता की राह पर समझदारी भरे कदम

इस्लाम की बात : एकता की राह पर समझदारी भरे कदम

सैयद सलमान मुंबई

भारत का इतिहास अनेकता में एकता का इतिहास है। यहां हर थोड़ा-बहुत अलग दिखनेवाला रंग, हर धर्म, हर परंपरा अंतत: उसी धारा से जुड़ती है, जिसमें जीवन का उत्सव बहता है। यह संयोग नहीं कि लगातार तीसरे वर्ष ‘अनंत चतुर्थी’ और ‘ईद-ए-मिलादुन्नबी’ के जुलूस का दिन करीब-करीब एक ही दिन पड़ रहे हैं। यह मान लेने में हिचक नहीं होनी चाहिए कि प्रकृति अपने ढंग से इशारा करती है कि त्योहार केवल धर्म के उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक मेलजोल और एकता की याद दिलाने वाले अवसर हैं।
करारा जवाब
अनंत चतुर्थी पर गणपति विसर्जन की परंपरा है और ईद-ए-मिलादुन्नबी पर पैगंबर मोहम्मद साहब की जयंती का जुलूस निकलता है। दोनों पर्वों का स्वरूप ऐसा है कि सार्वजनिक स्थानों और सड़कों पर भीड़ एकत्र होती है। स्वाभाविक ही है कि ऐसे समय में सहयोग और समन्वय सर्वोपरि होना चाहिए। आदर्श स्थिति यह होती कि दोनों समुदाय मिलकर, एक साथ बैठकर रूट तय करते और इस संयुक्त प्रयास को उत्सव का हिस्सा बना देते। लेकिन आज का सामाजिक माहौल इससे भिन्न है। दोनों ओर ऐसा जहर बोया गया है कि विश्वास और संवाद की डोर कमजोर पड़ती जा रही है। यही कारण है कि जब मौजूदा हालात में मुस्लिम समाज ने पहल कर ईद-ए-मिलादुन्नबी का जुलूस दो दिन आगे बढ़ाने का निर्णय लिया तो यह प्रशासनिक समझदारी के साथ-साथ गहरी सामाजिक जिम्मेदारी का प्रमाण बन गया। इस कदम से उन शरारती तत्वों को करारा जवाब मिला, जो सामाजिक वैमनस्य पैâलाने के अवसर तलाशते रहते हैं। इससे हिंदू समाज को भी राहत मिली होगी, क्योंकि त्योहारों का आनंद तभी संभव है जब आशंका और तनाव का वातावरण न हो।
दरअसल, सामाजिक जीवन तभी स्वस्थ रह सकता है जब सभी समुदाय एक-दूसरे का ख्याल रखें। भाइयों में जैसा संबंध होता है, वैसा ही हिंदू और मुसलमानों के बीच अलग-अलग विश्वास और प्रथाएं होते हुए भी साझा जिंदगी का रिश्ता है। यदि मुस्लिम समाज ने खुद को छोटे भाई की भूमिका में रखकर पीछे हटने का उदाहरण प्रस्तुत किया है तो हिंदू समाज की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। उसे भी बड़ा भाई बनकर संवेदनशीलता और लचीलापन दिखाना होगा। इस व्यावहारिक समझ में यह संदेश छुपा है कि धर्म का अर्थ कभी भी टकराव नहीं होता। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम इसका साक्षी है। पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्लाह खान, भगत सिंह और उधम सिंह जैसे अमर शहीद उस साझा धारा के प्रतीक हैं, जिसके बिना स्वतंत्रता अधूरी थी। देश ने जिस कीमत पर आजादी पाई है, उसे सही मायने में तभी पूरा माना जाएगा जब हिंदू और मुसलमान रिश्ते में प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि सहभागी बनेंगे। समस्या यह है कि वर्तमान दौर में कई ताकतें दोनों समाज की एकता से असहज महसूस करती हैं। उनके लिए नफरत और हिंसा ही राजनीति का ईंधन है। ऐसे माहौल में समझदारी दिखाना पूरे समाज को बचाना है। यही छोटा-सा बदलाव सारी दिशा बदल सकता है।
भारत की ताकत
फिर भी जिम्मेदारी यहीं समाप्त नहीं होती। यह जरूरी है कि मुस्लिम समाज ईद-ए-मिलादुन्नबी के जुलूस को शांतिपूर्ण बनाए। डीजे का शोर, भड़काऊ नारों का इस्तेमाल या ट्रैफिक का अवरोध, यह सब उस पुण्य निर्णय की गरिमा को कम कर देगा जो जुलूस की तारीख बदलकर लिया गया है। प्रशासन के साथ सहयोग कर यदि यह जुलूस पूरी शांति से निकले तो उसका असर एक दिन तक सीमित न रहकर, मुस्लिम समाज की छवि और आपसी विश्वास को लंबे समय तक मजबूत रखेगा। वैसे ही हिंदू समाज के लिए भी यह अवसर आत्ममंथन का है। वह यह सोचे कि गणपति बाप्पा के विसर्जन का वास्तविक अर्थ केवल जुलूस निकालना नहीं है, बल्कि सबको एक साथ जोड़ने का भाव है। यदि हर उत्सव में हम यह देखें कि हमारे कर्मों से किसी दूसरे को कष्ट तो नहीं, हमारे आचरण से समाज में विभाजन तो नहीं तो शायद उत्सवों की आत्मा जीवित रह सकेगी।
जरूरत अब उस साहस की है, जिसमें हम उन ताकतों को पहचानें और नकारें जो इस भाईचारे की डोर को काटना चाहती हैं। समाज को चाहिए कि वह उन्हें हाशिए पर डाल दे और उनके लिए कोई जगह न छोड़े। जब ईमानदार लोग आगे बढ़कर संवाद और सहयोग करते हैं तो नफरत पैâलानेवालों की राजनीतिक दुकानें अपने आप बंद हो जाती हैं। त्योहार तभी सच्चे हैं जब वे केवल धार्मिक अनुष्ठान न होकर पूरे समाज को सुगंधित बनाते हैं। इस वर्ष अनंत चतुर्थी और ईद-ए-मिलादुन्नबी का मेल एक अवसर है यह सिद्ध करने का कि भारत की ताकत इसकी विविधता है। यह अवसर है यह दिखाने का कि समझदारी और त्याग कभी कमजोरी नहीं होते, बल्कि वे ही सच्ची शक्ति हैं। हिंदू और मुसलमान भारत की दो आंखें हैं। जरूरी है कि दोनों आंखें खुली रहें, साफ रहें, साथ देखें। तभी यह देश वह रोशनी देख सकेगा जिसका सपना बिस्मिल और अशफाक ने मिलकर देखा था।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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